Thursday, October 28, 2010

Have we really lost it??

YES...We have lost village panchayat election!

People say, the truth prevails...believe me at one point of time I thought so and am not saying that I have stopped believing on it...But its a fact that we lost. We lost to those who were untruthful, unfaithful...

But I am happy that we fought in a very clean and decent way...but is it enough to fight an election this way; that too in eastern Uttar Pradesh...probably not....nope, I am damn sure you can not win an election in a decent way...politics can not be done sitting on the bank of it...you need to enter into deep...feel it, be part of it, gulp it and then come out...probably we did not do this way.

what was our hypothesis? we thought if we show our villagers that look "we are a well educated family, working at various top level positions. We know various policies and programmes run by govt and we have a vision for the villgae" they would vote for me...but probably we did not consider the null hypothesis, a very basic concept I learnt while working on research projects. we should have started with null hypothesis and worked backward.

I watched Rakth Charitra few days back and realized that the truth prevails but for this you need to have enormous power, strength and capacity to work as a parallel govt if needed...but we didnt have all this. why this is needed in a village like ours? those who have not stayed in villages might find it absurd, but let me tell you one story:
"during the election campaigning one of the SC community person came and told me that the other party is threating him of dire consequences after elections are over because he was supporting us. Now I had to assure him that nothing like this would happen; but I and he both knew that I do not have power with me and the administration was in other person's favor. I tried but failed to assure him that 'nothing would happen to him'".

Now morale of this is that whether its village politics or politics on road one need to have enough support to form a parallel government if required; by saying this am not meaning that there is no relevance to regular govt but you would agree to me that most of the time you need to act differently, if want to get your work done through govt systems.

I am disappointed by the result; but at the same time getting the real feel of politics. Hopefully time would come when, we would be able to prove that the truth prevails. We need to work differently. We need to plan for next elections. 

We would bounce back...thats for sure.

Monday, October 25, 2010

मेरा राजनैतिक अनुभव: २०१०

राजनीति हमारे समाज का इक अभिन्न अंग है, चाहते या ना चाहते हुए भी हम इससे जुड़े रहते हैं. यह संभव है कि हम प्रत्यक्ष रूप से इसकी निंदा करें परन्तु हमें इस बात का ज्ञान है कि इसके बिना हमारे समाज कि व्यवस्था नहीं चल सकती. किसी व्यक्ति विशेष लिए राजनीति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब वो या उसके परिवार को कोई सदस्य राजनीति का एक हिस्सा बनने के लिए कदम उठता है. 


इस बार ऐसा ही मेरे साथ हुआ; भारतवर्ष के सबसे बड़े प्रदेश (उत्तर प्रदेश) में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों कि घोषणा कि गयी और मेरे पिताजी ने पिछले १५ वर्षों से चली आ रही व्यवस्था को चुनौती देने का साहस किया. हमारे गाँव के लिए यह एक महत्वपूर्ण विषय था क्यूंकि बहुत सारे मुद्दों पर पिछले १०-१५ वर्षों में अनदेखी कि गयी थी. मैंने और मेरे परिवार ने पहले तो इस बात का विरोध किया कि उनको इस राजनीति में नहीं आना चाहिए परन्तु परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि अंततः हमारे पूरे परिवार ने पिताजी का साथ देने का निश्चय किया. 


यह इक नया अनुभव था पूरे परिवार के लिए. यूँ तो पिताजी पहले भी राजनीति का हिस्सा रह चुके हैं और उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में मजदूर संघ के संचालन को इक नयी दिशा दी थी, परन्तु गाँव कि राजनीति उनके लिए भी एक नया अनुभव था. उनका विश्वास था पिछले १०-१५ वर्षो में गाँव के लोगों के लिए कि गयी निःस्वार्थ सेवा उनको गाँव कि राजनीति में आगे आने में मदद करेगी. उनके विश्वास को और मजबूती देने के लिए हमारा पूरा परिवार इस पहल में उनके साथ हो लिया. 


मैंने अपनी स्नातक कि पढाई के दौरान कुछ राजनैतिक गतिविधियों में भाग लिया था परन्तु यह मेरे लिए पूरी तरह से एक नया अनुभव था. गाँव कि समस्याएं हर परिवार के लिए अलग होती हैं, इसलिए इक सार्वजनिक मुद्दे पर चुनाव लड़ना मुश्किल होता है. इसलिए हमने हर परिवार कि समस्याओं का विश्लेषण किया और कुछ अति महत्वपूर्ण मुद्दों को इस चुनाव में उठाया जो कि गाँव के बहुसंख्य लोगों से सम्बंधित थीं.


मैंने अपने १२-१५ दिन के प्रवास में ये अनुभव किया कि राजनीति में आने के लिए केवल उत्साह और महत्वाकांक्षा को होना जरूरी नहीं है, बल्कि मूलभूत समस्याओं का सही ज्ञान और उनके निस्तारण करने कि सही योजना का होना भी बहुत जरूरी है. कम से कम ग्राम पंचायत चुनाव के दौरान, मतदाता और भी अधिक सतर्कता से निर्णय लेते हैं क्यूंकि वे एक-एक प्रत्याशी के आचार-विचार, कार्यशैली और इतिहास को बखूबी जानते हैं. इसके अतिरिक्त मतदाता का अपना स्वार्थ भी उसके निर्णय में एक भूमिका निभाता है. 


मेरे  गाँव के चुनाव में भी ये सारी बातें देखने को मिली; जहाँ एक तरफ कुछ प्रत्याशियों ने जम कर पैसा बहाया, दूसरों ने खाने-खिलाने का काम किया. यह सब काले धन का कमाल था. चूँकि हमारी विचारधारा भी इन बातों से मेल नहीं खाती थी और हमारे पास काले धन का कोई स्रोत नहीं था, हमने अपने आप को इनसे दूर रखा. परन्तु आश्चर्यजनक बात यह थी कि खाने और पैसा लेने के बाद इनमे से कुछ मतदाता हमारे पास आते थे और हमको बोलते थे कि ये सारे हथकंडे अब उनके ऊपर काम नहीं आने वाले और उन्हें पता है कि यह केवल चार दिन कि चांदनी हैं. उन्होंने यंहा तक भी कहा कि उनका निर्णय इन हथकंडो पर नहीं बल्कि उनकी समस्याओं पर निर्भर होगा.


हमने एक-एक घर जा कर अपनी बात राखी, ना बल का प्रदर्शन किया ना ही पैसे कि ताकत दिखाई; हमने हर एक परिवार को इस विश्वास में लेने कि कोशिश कि यदि हम सत्ता में आते हैं तो किस प्रकार हर परिवार कि समस्यों को दूर करने कि कोशिश करेंगे. कुछ अन्य प्रत्याशियों ने जातिवादी राजनीति को हवा देने कि कोशिश के परन्तु हमने गाँव के सारे लोगों से एक जैसा व्यवहार किया. कुछ अन्य बातें जो सीखने को मिली:
१) गाँव कि राजनीति को केवल राजनैतिक पहलू से देखने कि कोशिश ना करें. बहुत सारे मुद्दे व्यक्तिगत होते हैं, जिनका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए.
२) हर परिवार के समस्या अलग हो सकती है, और आपके पास हर इस समस्या के समाधान कि योजना होनी चाहिए.
३) जहाँ तक संभव हो जातिगत राजनीति से अपने को दूर रखना चाहिए और किसी जाती विशेष के प्रति कोई प्रतिकूल टिपण्णी नहीं करनी चाहिए.
४) गाँव के प्रभावशाली और प्रबुद्ध लोगों को अपने विचारों से प्रभावित करना चाहिए और ये सुनिश्चित करना चाहिए कि वे आपकी बातों से प्रभावित हों.
५) गाँव का युवा वर्ग एक महत्वपूर्ण कड़ी होता है, आपके पास ऐसी योजनायें होनी चाहिए जिससे वे आपसे जुड़ जाएँ.


चुनाव हो चुके हैं और अब परिणाम कि प्रतीक्षा हो रही है, मुझे विश्वास है कि हमारा प्रदर्शन बेहतर होगा. अगर हम जीत जातें हैं तो इस गाँव के इतिहास में पहली बार होगा कि एक प्रबुद्ध एवं शिक्षित परिवार शासन कि बागडोर संभालेगा. इसी उम्मीद के साथ मैं अभी आप सबसे विदा लेता हूँ और ये आशा करता हूँ कि परिणाम हमारे पक्ष में आये.


धन्यवाद!



Saturday, October 2, 2010

नए पंखों के साथ,
       उम्मीदों कि नयी रोशनी कि ओर,
चल पड़ा हूँ मैं,
      पकड़ कर साहस और स्वाभिमान कि डोर,

रस्ते वही हैं,
    बंद दरवाजो के ताले वही हैं,
पर विश्वास मन में है,
     कि तोड़ देंगे ये सारे अवरोध...............................नए पंखों के साथ...!

Thursday, September 23, 2010

विचारधारा बदलने कि आवश्यकता है......!

विचारधारा बदलने कि आवश्यकता है,
चुनौती लेने कि आवश्यकता है,
भ्रष्ट नहीं है केवल नेता इस देश के,
हमे भी सुधरने कि आवश्यकता है.........विचारधारा बदलने कि आवश्यकता है!

नियम/कानून बहुत से हैं इस देश में,
दलाल भी बैठें है, सफेदपोशों के वेश में,
रिश्वत देने से काम बन जाएगा,
ऐसी मानसिकता को बदलने कि आवश्यकता है.........विचारधारा बदलने कि आवश्यकता है!

सड़कों पर गड्ढो को दोष देते हैं,
पर आधी सड़क पर गाडी खड़ी रखते हैं,
पानी के निकास को अवरुद्ध करते हैं,
और नियमों का उल्लंघन करते हैं.....
हमे भी उत्तरदायित्व लेने कि आवश्यकता है.........विचारधारा बदलने कि आवश्यकता है!

शायद ये बदलाव कि डगर आसन ना हो,
आने वाली कठिनाईयों का भान ना हो,
पर हमे ये डगर चुनने कि आवश्यकता है
विचारधारा बदलने कि आवश्यकता है.......चुनौती लेने कि आवश्यकता है......!

Saturday, September 18, 2010

कोई दर्द आँखों में पलता है......!

कोई दर्द आँखों में पलता है,
हर घड़ी, इक टीस सी देता है,
हिस्सा बन गया है अब ये, मेरी ज़िन्दगी का!
आँसू के रस्ते भी नहीं निकलता है.


ढूंढता फिर रहा हूँ मै, अपनी ख़ुशी को,
पाना चाहता हूँ फिर उस हंसी को,
कल मिली थी खुशी कि कुछ लकीरें,
अब तो ढूँढने से भी उनका निशां नहीं मिलता है.......कोई दर्द आँखों में...!


लोग कहते हैं कि मैं ऐसा ना था,
सूरज कि किरनों सा! बुझती लौ सा ना था.
शायद कुछ सच सा है उनकी बातो में,
तभी तो हर सुबह में शाम का एहसास होता है....कोई दर्द आँखों में...!

Sunday, August 15, 2010

उठ जरा कदम बढ़ा...!

मेरी ये कविता वीर रस कि है, मैंने अपने भावों को एक नए तरीके से पिरोने का प्रयास किया है, आशा है आपको पसंद आएगी:

(उठ जरा कदम बढ़ा!
क्रांति का बिगुल बजा!
इस समाज कि जड़ों को,
आज फिर से तू हिला) - 2

तू क्रांतिवीर है, तू ही तो,
सर्वशक्तिमान है.......,
बदल सके है भाग्य को,
तू ही! महान है.
इन नसों में आज फिर से,
उष्ण रक्त तो बहा......                                                     उठ जरा कदम बढ़ा.....!

बह रहा है रक्त....
लोग हैं विरक्त.....
तू आज ले शपथ.....
दुश्मनों के नाश को
जुर्म के विनाश को.
आज फिर से प्रण उठा......                                            उठ जरा कदम बढ़ा...!

सो रहें है नौजवान ....
आज कर तू आह्वान....
फिर से गा तूं वीर गान...
चेतना नयी, फिर से उनमे तूं जगा.....                           उठ जरा कदम बढ़ा...!

Saturday, August 14, 2010

स्वतंत्रता दिवस

भारतवर्ष के ६३वें स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में, मैं अपने कुछ विचार प्रस्तुत करता हूँ. मुझे आशा है कि, आप सब लोग इस देश को उन्नति और समभाव के शिखर पर ले जाने के लिए प्रयासरत रहेंगे. जय हिंद! 


आज फिर से १५ अगस्त का दिन आया,
कुछ ने भाषण दिए, कुछ ने झंडा फहराया,
हम जैसे लोगो ने भी कुछ ज्ञान गंगा बहाया,
और नए बदलावों पर कुछ 'दर्शन' दिखाया.


हर वर्ष हम ऐसा ही कुछ करते हैं,
फिर पूरे साल चुप रह कर तमाशा देखते हैं,
कभी सरकार को तो कभी व्यवस्था को बुरा भला कहते हैं,
पर इनको बदलने का कभी प्रयास नहीं करतें हैं.


हमें इन सारी कवायदों से बाहर निकलना है.
हमारी सोयी हुई उर्जा का संचार करना है...
हम ही नेता है हमारे भविष्य के,
आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुनहरा कल रचना है...


आज अवसर है एक नया प्रण लेने के लिए...
विचार करने के लिए, बदलाव लाने के लिए...
हम फिर से इंतज़ार ना करें, एक नए १५ अगस्त का..
नव सृजन करने के लिए, नया इतिहास रचने के लिए 

Wednesday, August 4, 2010

माँ

अकेले तन्हा मै बैठा हूँ, घर से इतनी दूर.
पर मै भी क्या कर सकता हूँ, मै तो हूँ मजबूर.

जब याद तुम्हारी आती है, ये ह्रदय व्यथित हो जाता है,
तेरी आँचल कि खातिर "माँ", ये मन तडपा जाता है.

क्या करूँ कहूँ मै किससे? ये रात भयावह लगती है,
रह-२ कर संशय उठता है, जब नीद मुझे आ जाती है.

हर सपने में तेरा चेहरा, तेरा ही अक्स उभरता है,
तू अभी यहाँ आ जायेगी, हर पल ऐसा लगता है.

Tuesday, August 3, 2010

मेरा आवारापन..

कई रास्ते मिले, कई मंजिलें मिलीं,
जिंदगी के सफ़र में, कई मुश्किलें मिलीं..
कुछ ऐसे भी मोड़ थे, जहाँ था खालीपन,
पर रुकते नहीं कदम, और ये आवारापन...!!

कोई साथी भी ना हो, कोई कारवां ना हो,
इक डगर नयी हो, कोई रेहनुमा ना हो,
चलता रहूँ मै, ना दिल में कोई गम,
रुकते नहीं कदम, और ये आवारापन...!!

Friday, July 30, 2010

कॉमन-वेल्थ खेल!

पूरा सरकारी तंत्र कॉमन-वेल्थ खेल का नारा लगा रहा,
कोई खेल के नियमों को, तो कोई खेल का ही किनारा लगा रहा है,
बहुत सारे लोगों के भाग्य बदल गए हैं यहाँ पर,
मारुती 800 छोड़ आज वो (नेता, कान्ट्रेक्टर, आदि) BMW  चला रहा है.

खिलाड़ियों कि तैयारी कि बात ना करें आप.
वो तो भाग्य भरोसे ही रहेंगे,
क्यूंकि उनके लिए आये पैसों से,
कोई अपने लिए नए फर्नीचर तो कोई नए घर बना रहा है.

मैंने देखा इक खिलाड़ी जी-जान से तैयारी कर रहा है,
इसलिए नहीं कि वो दौड़ में जीत जाए,
बल्कि इसलिए कि कैसे टूटे-फूटे रन-वे पे खुद को बचा पाए.
वो तो इन गुरुओं (नेताओं) के खेल में गोते लगा रहा है....!

7 सालों से कार्यक्रम कि योजना बन रही है,
हर दिन काम पूरी होने कि तारीख बदल रही है...
अब तो चेत जाओ हमारी सरकार के खेल सम्राटों,
वरना कॉमन-वेल्थ के साथ भारत का अभिमान भी जा रहा है......!

Thursday, July 29, 2010

हर नीद में हर ख्वाब में......!

हर नीद में हर ख्वाब में...
हर सुबह में, हर रात में...
है तेरा अक्स बसा हुआ...
अब मेरे हर ज़ज्बात में...

मेरे दिल का हाल ना पूछ तू...
हर धड़कन पे तेरा नाम है...
तेरी आशिकी ही मेरी बन्दिगी...
तुझे पूजना ही मेरा काम है....

तू साथ है तो हैं जन्नतें...
वरना हर पल वीरान है...
तेरी खुशियाँ ही मेरा सब कुछ है...
तेरे सारे गम मेरे नाम है.....

मेरी मंजिलें जब भी हो पूरी...
वो बस हो तेरे साथ में....हर नींद में हर ख्वाब में.....!!

Wednesday, July 28, 2010

क्या लिखूं?

क्या लिखूं? कुछ भी समझ नहीं आता...
शब्द आते है पर भाव नहीं आता...

क्या भाव के बिना भी कविता बनती है?
शायद आज कल ऐसी ही रचनाये दिखती हैं..
मेरे मन को ये बदलाव रास नहीं आता....क्या लिखूं?.....

हम क्यों नहीं पढ़ते द्विवेदी और  गुप्त को?
समझे उनके भाव, अलंकार और छंद को..
इनके बिना इक सुन्दर रचना का विश्वास नहीं आता....क्या लिखूं?...

Wednesday, July 14, 2010

मैंने गाँव में हरियाली देखी थी

मैंने गाँव में हरियाली देखी थी...
सुरमई शाम, और खुशहाली देखी थी...
लोग एक-दूसरे से गले मिलते थे...
मैने वो दिवाली और वो होली देखी थी...

चिड़ियों का कलरव और गायों का रम्भाना देखा था...
कंधे पर बैठे बच्चों का खेतों में जाना देखा था...
उन छोटी छोटी खुशियों में लोगों का समाना देखा था...
वो ओस से भीगी धरती पर सूरज कि किरने अच्छी थी.....मैंने गाँव में.......!!

शायद अब वो पल बीत चुके...
खुशियों के बेलें सूख चुकी.....
नफरत कि आंधी बढ़ने लगी.....
जहाँ हर वक़्त मुहब्बत देखी थी...मैंने गाँव में...!!

फूलों से खुशबू उड़ने लगी...
हर पेड़ पे कांटे उगने लगे.....
उन गलियों में है सन्नाटा...
जहाँ आपस में बातें होती थी....मैंने गाँव में...!!

Sunday, July 11, 2010

बारिश कि बूंदें.......

बारिश कि बूंदों ने फिर, अपना करतब दिखलाया.
धरती के सीने पर, प्यार का बादल बरसाया.
मिटटी कि सोंधी खुशबू ने, घर आंगन सब महकाया.
पुरवा हवा के झोकों से, फिर मेरा मन भी ललचाया.

झम-झम के पानी फिर बरसा, हरियाली खेतो में छाई.
हर किसान के चेहरे पे, उम्मीद कि किरने लहराई.
बागों में चिड़िया चहकें, और इक संगीत बजाये.
कल कल करती नदियाँ भी, ताल से ताल मिलाएं.
टिप-टिप बूंदों के स्वर ने, इक नव संगीत बनाया
...........बारिश कि बूंदों ने...!

Saturday, July 10, 2010

बचपन के दिन.....

बचपन के दिन फिर से आयें....
झूला झूलें, गाना गायें....
मिटटी में फिर खेलें कूदें....
जब जी चाहे नदी नहायें....

चिंता ना हो सर पर अपने....
देखें जी भर के हम सपने....
उन सपनों में फिर खो जाएँ........................बचपन के दिन.....!

Wednesday, July 7, 2010

सुन्दरता..!

सुन्दरता कि परिभाषा, परिभाषित करने आई है.
एक अनिंद्य सुंदरी सपनो में मेरे छाई है.
उसके आने से फूल खिलें,
पदचापों से एक लहर उठे,
मेरे मन के तारों पे संगीत बजाने आई है.
सुन्दरता कि परिभाषा......................!

आज फिर से क्रांति का, बिगुल बजाते क्यूँ नहीं?

आज फिर से क्रांति का, बिगुल बजाते क्यूँ नहीं?
एक नए समाज को, फिर बनाते क्यूँ नहीं?

क्यूँ कर डरते हैं हम, कोई मुद्दा उठाने से?
आज फिर से एक नया, इतिहास बनाते क्यूँ नहीं?

कब तलक चलेगी जिंदगी यूँ ही उम्मीद पर?
हम खुद कि एक डगर नयी, बनाते क्यूँ नहीं?....Rahul

Monday, July 5, 2010

कर्मठी पुरुष..!

कर्मठी पुरुष की कार्यक्षमता प्रतिकूल परिस्थितियों में ही रंग लाती है.

जिस तरह मेहँदी पत्थर पर घिसने के बाद ही काम आती है.
बिना परिश्रम का जीवन तो एक नाकारा व्यक्ति ही जी सकता है.
सफल मनुष्य की किस्मत तो संघर्ष के बाद ही जगमगाती है.....

बारिश का इंतज़ार... !!

सूखी धरती के परतों को देखकर मन व्यथित सा हो चला,
पंख लगाकर मै आकाश कि ओर उड़ चला.
मन में एक प्रश्न लिए, कि!
कब आएगी बहार इस ओर? कब नाचेंगे धरती पर मोर?
और, कब करेंगी बारिश कि बूंदे एक मीठा सा शोर?

पर मुझे एक निराशा ही हाथ लगी,
बादलों का का कारवां नहीं, बस एक छोटी सी टोली मिली.
मन को दिलासा देने के लिए कुछ बूंदे उधार ले ली मैंने.
फिर वापस धरती पर आने कि राह पकड़ ली मैंने.

अब तो लगता है उम्मीद भी टूट जायेगी.
बारिश कि बूंदों कि कमी आंसुओं से पूरी कि जायेगी.

मेरी पहली कविता......1997

क्षण प्रतिक्षण जीवन कि नैया, मध्य भंवर को जाती है.
पतवार ना हो यदि संस्कारों कि तो फिर डूब ही जाती है.
इसलिए हे मनुष्य संस्कारित बनो सुविचारित बनो,
जीवन के पथ पर सदैव अग्रसर रहो, ना पीछे हटो.
असफलता के क्षण में भी साहस का साथ ना छोड़ो तुम,
पुनः विजयश्री प्राप्त करो, विश्वजीत दिग्विजयी हो तुम.
अपने इस कर्त्तव्य लोक में स्वार्थपरकता का त्याग करो,
वसुधैव कुटुम्बकम के पथ पर जीवन का निर्वाह करो.