Friday, July 30, 2010

कॉमन-वेल्थ खेल!

पूरा सरकारी तंत्र कॉमन-वेल्थ खेल का नारा लगा रहा,
कोई खेल के नियमों को, तो कोई खेल का ही किनारा लगा रहा है,
बहुत सारे लोगों के भाग्य बदल गए हैं यहाँ पर,
मारुती 800 छोड़ आज वो (नेता, कान्ट्रेक्टर, आदि) BMW  चला रहा है.

खिलाड़ियों कि तैयारी कि बात ना करें आप.
वो तो भाग्य भरोसे ही रहेंगे,
क्यूंकि उनके लिए आये पैसों से,
कोई अपने लिए नए फर्नीचर तो कोई नए घर बना रहा है.

मैंने देखा इक खिलाड़ी जी-जान से तैयारी कर रहा है,
इसलिए नहीं कि वो दौड़ में जीत जाए,
बल्कि इसलिए कि कैसे टूटे-फूटे रन-वे पे खुद को बचा पाए.
वो तो इन गुरुओं (नेताओं) के खेल में गोते लगा रहा है....!

7 सालों से कार्यक्रम कि योजना बन रही है,
हर दिन काम पूरी होने कि तारीख बदल रही है...
अब तो चेत जाओ हमारी सरकार के खेल सम्राटों,
वरना कॉमन-वेल्थ के साथ भारत का अभिमान भी जा रहा है......!

Thursday, July 29, 2010

हर नीद में हर ख्वाब में......!

हर नीद में हर ख्वाब में...
हर सुबह में, हर रात में...
है तेरा अक्स बसा हुआ...
अब मेरे हर ज़ज्बात में...

मेरे दिल का हाल ना पूछ तू...
हर धड़कन पे तेरा नाम है...
तेरी आशिकी ही मेरी बन्दिगी...
तुझे पूजना ही मेरा काम है....

तू साथ है तो हैं जन्नतें...
वरना हर पल वीरान है...
तेरी खुशियाँ ही मेरा सब कुछ है...
तेरे सारे गम मेरे नाम है.....

मेरी मंजिलें जब भी हो पूरी...
वो बस हो तेरे साथ में....हर नींद में हर ख्वाब में.....!!

Wednesday, July 28, 2010

क्या लिखूं?

क्या लिखूं? कुछ भी समझ नहीं आता...
शब्द आते है पर भाव नहीं आता...

क्या भाव के बिना भी कविता बनती है?
शायद आज कल ऐसी ही रचनाये दिखती हैं..
मेरे मन को ये बदलाव रास नहीं आता....क्या लिखूं?.....

हम क्यों नहीं पढ़ते द्विवेदी और  गुप्त को?
समझे उनके भाव, अलंकार और छंद को..
इनके बिना इक सुन्दर रचना का विश्वास नहीं आता....क्या लिखूं?...

Wednesday, July 14, 2010

मैंने गाँव में हरियाली देखी थी

मैंने गाँव में हरियाली देखी थी...
सुरमई शाम, और खुशहाली देखी थी...
लोग एक-दूसरे से गले मिलते थे...
मैने वो दिवाली और वो होली देखी थी...

चिड़ियों का कलरव और गायों का रम्भाना देखा था...
कंधे पर बैठे बच्चों का खेतों में जाना देखा था...
उन छोटी छोटी खुशियों में लोगों का समाना देखा था...
वो ओस से भीगी धरती पर सूरज कि किरने अच्छी थी.....मैंने गाँव में.......!!

शायद अब वो पल बीत चुके...
खुशियों के बेलें सूख चुकी.....
नफरत कि आंधी बढ़ने लगी.....
जहाँ हर वक़्त मुहब्बत देखी थी...मैंने गाँव में...!!

फूलों से खुशबू उड़ने लगी...
हर पेड़ पे कांटे उगने लगे.....
उन गलियों में है सन्नाटा...
जहाँ आपस में बातें होती थी....मैंने गाँव में...!!

Sunday, July 11, 2010

बारिश कि बूंदें.......

बारिश कि बूंदों ने फिर, अपना करतब दिखलाया.
धरती के सीने पर, प्यार का बादल बरसाया.
मिटटी कि सोंधी खुशबू ने, घर आंगन सब महकाया.
पुरवा हवा के झोकों से, फिर मेरा मन भी ललचाया.

झम-झम के पानी फिर बरसा, हरियाली खेतो में छाई.
हर किसान के चेहरे पे, उम्मीद कि किरने लहराई.
बागों में चिड़िया चहकें, और इक संगीत बजाये.
कल कल करती नदियाँ भी, ताल से ताल मिलाएं.
टिप-टिप बूंदों के स्वर ने, इक नव संगीत बनाया
...........बारिश कि बूंदों ने...!

Saturday, July 10, 2010

बचपन के दिन.....

बचपन के दिन फिर से आयें....
झूला झूलें, गाना गायें....
मिटटी में फिर खेलें कूदें....
जब जी चाहे नदी नहायें....

चिंता ना हो सर पर अपने....
देखें जी भर के हम सपने....
उन सपनों में फिर खो जाएँ........................बचपन के दिन.....!

Wednesday, July 7, 2010

सुन्दरता..!

सुन्दरता कि परिभाषा, परिभाषित करने आई है.
एक अनिंद्य सुंदरी सपनो में मेरे छाई है.
उसके आने से फूल खिलें,
पदचापों से एक लहर उठे,
मेरे मन के तारों पे संगीत बजाने आई है.
सुन्दरता कि परिभाषा......................!

आज फिर से क्रांति का, बिगुल बजाते क्यूँ नहीं?

आज फिर से क्रांति का, बिगुल बजाते क्यूँ नहीं?
एक नए समाज को, फिर बनाते क्यूँ नहीं?

क्यूँ कर डरते हैं हम, कोई मुद्दा उठाने से?
आज फिर से एक नया, इतिहास बनाते क्यूँ नहीं?

कब तलक चलेगी जिंदगी यूँ ही उम्मीद पर?
हम खुद कि एक डगर नयी, बनाते क्यूँ नहीं?....Rahul

Monday, July 5, 2010

कर्मठी पुरुष..!

कर्मठी पुरुष की कार्यक्षमता प्रतिकूल परिस्थितियों में ही रंग लाती है.

जिस तरह मेहँदी पत्थर पर घिसने के बाद ही काम आती है.
बिना परिश्रम का जीवन तो एक नाकारा व्यक्ति ही जी सकता है.
सफल मनुष्य की किस्मत तो संघर्ष के बाद ही जगमगाती है.....

बारिश का इंतज़ार... !!

सूखी धरती के परतों को देखकर मन व्यथित सा हो चला,
पंख लगाकर मै आकाश कि ओर उड़ चला.
मन में एक प्रश्न लिए, कि!
कब आएगी बहार इस ओर? कब नाचेंगे धरती पर मोर?
और, कब करेंगी बारिश कि बूंदे एक मीठा सा शोर?

पर मुझे एक निराशा ही हाथ लगी,
बादलों का का कारवां नहीं, बस एक छोटी सी टोली मिली.
मन को दिलासा देने के लिए कुछ बूंदे उधार ले ली मैंने.
फिर वापस धरती पर आने कि राह पकड़ ली मैंने.

अब तो लगता है उम्मीद भी टूट जायेगी.
बारिश कि बूंदों कि कमी आंसुओं से पूरी कि जायेगी.

मेरी पहली कविता......1997

क्षण प्रतिक्षण जीवन कि नैया, मध्य भंवर को जाती है.
पतवार ना हो यदि संस्कारों कि तो फिर डूब ही जाती है.
इसलिए हे मनुष्य संस्कारित बनो सुविचारित बनो,
जीवन के पथ पर सदैव अग्रसर रहो, ना पीछे हटो.
असफलता के क्षण में भी साहस का साथ ना छोड़ो तुम,
पुनः विजयश्री प्राप्त करो, विश्वजीत दिग्विजयी हो तुम.
अपने इस कर्त्तव्य लोक में स्वार्थपरकता का त्याग करो,
वसुधैव कुटुम्बकम के पथ पर जीवन का निर्वाह करो.