Wednesday, July 14, 2010

मैंने गाँव में हरियाली देखी थी

मैंने गाँव में हरियाली देखी थी...
सुरमई शाम, और खुशहाली देखी थी...
लोग एक-दूसरे से गले मिलते थे...
मैने वो दिवाली और वो होली देखी थी...

चिड़ियों का कलरव और गायों का रम्भाना देखा था...
कंधे पर बैठे बच्चों का खेतों में जाना देखा था...
उन छोटी छोटी खुशियों में लोगों का समाना देखा था...
वो ओस से भीगी धरती पर सूरज कि किरने अच्छी थी.....मैंने गाँव में.......!!

शायद अब वो पल बीत चुके...
खुशियों के बेलें सूख चुकी.....
नफरत कि आंधी बढ़ने लगी.....
जहाँ हर वक़्त मुहब्बत देखी थी...मैंने गाँव में...!!

फूलों से खुशबू उड़ने लगी...
हर पेड़ पे कांटे उगने लगे.....
उन गलियों में है सन्नाटा...
जहाँ आपस में बातें होती थी....मैंने गाँव में...!!

2 comments:

  1. Indeed a good attempt RP.
    2 Points to ponder
    1st is mohabbat a hindi word or urdu. well i,m not sure.
    2nd is that can it end in a happy note. there are grey shades in this particular poem. happy ending like bollywood movies.

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  2. Mature n refine poem Rahul exact same words I can safely use for you :)

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