Sunday, August 15, 2010

उठ जरा कदम बढ़ा...!

मेरी ये कविता वीर रस कि है, मैंने अपने भावों को एक नए तरीके से पिरोने का प्रयास किया है, आशा है आपको पसंद आएगी:

(उठ जरा कदम बढ़ा!
क्रांति का बिगुल बजा!
इस समाज कि जड़ों को,
आज फिर से तू हिला) - 2

तू क्रांतिवीर है, तू ही तो,
सर्वशक्तिमान है.......,
बदल सके है भाग्य को,
तू ही! महान है.
इन नसों में आज फिर से,
उष्ण रक्त तो बहा......                                                     उठ जरा कदम बढ़ा.....!

बह रहा है रक्त....
लोग हैं विरक्त.....
तू आज ले शपथ.....
दुश्मनों के नाश को
जुर्म के विनाश को.
आज फिर से प्रण उठा......                                            उठ जरा कदम बढ़ा...!

सो रहें है नौजवान ....
आज कर तू आह्वान....
फिर से गा तूं वीर गान...
चेतना नयी, फिर से उनमे तूं जगा.....                           उठ जरा कदम बढ़ा...!

Saturday, August 14, 2010

स्वतंत्रता दिवस

भारतवर्ष के ६३वें स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में, मैं अपने कुछ विचार प्रस्तुत करता हूँ. मुझे आशा है कि, आप सब लोग इस देश को उन्नति और समभाव के शिखर पर ले जाने के लिए प्रयासरत रहेंगे. जय हिंद! 


आज फिर से १५ अगस्त का दिन आया,
कुछ ने भाषण दिए, कुछ ने झंडा फहराया,
हम जैसे लोगो ने भी कुछ ज्ञान गंगा बहाया,
और नए बदलावों पर कुछ 'दर्शन' दिखाया.


हर वर्ष हम ऐसा ही कुछ करते हैं,
फिर पूरे साल चुप रह कर तमाशा देखते हैं,
कभी सरकार को तो कभी व्यवस्था को बुरा भला कहते हैं,
पर इनको बदलने का कभी प्रयास नहीं करतें हैं.


हमें इन सारी कवायदों से बाहर निकलना है.
हमारी सोयी हुई उर्जा का संचार करना है...
हम ही नेता है हमारे भविष्य के,
आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुनहरा कल रचना है...


आज अवसर है एक नया प्रण लेने के लिए...
विचार करने के लिए, बदलाव लाने के लिए...
हम फिर से इंतज़ार ना करें, एक नए १५ अगस्त का..
नव सृजन करने के लिए, नया इतिहास रचने के लिए 

Wednesday, August 4, 2010

माँ

अकेले तन्हा मै बैठा हूँ, घर से इतनी दूर.
पर मै भी क्या कर सकता हूँ, मै तो हूँ मजबूर.

जब याद तुम्हारी आती है, ये ह्रदय व्यथित हो जाता है,
तेरी आँचल कि खातिर "माँ", ये मन तडपा जाता है.

क्या करूँ कहूँ मै किससे? ये रात भयावह लगती है,
रह-२ कर संशय उठता है, जब नीद मुझे आ जाती है.

हर सपने में तेरा चेहरा, तेरा ही अक्स उभरता है,
तू अभी यहाँ आ जायेगी, हर पल ऐसा लगता है.

Tuesday, August 3, 2010

मेरा आवारापन..

कई रास्ते मिले, कई मंजिलें मिलीं,
जिंदगी के सफ़र में, कई मुश्किलें मिलीं..
कुछ ऐसे भी मोड़ थे, जहाँ था खालीपन,
पर रुकते नहीं कदम, और ये आवारापन...!!

कोई साथी भी ना हो, कोई कारवां ना हो,
इक डगर नयी हो, कोई रेहनुमा ना हो,
चलता रहूँ मै, ना दिल में कोई गम,
रुकते नहीं कदम, और ये आवारापन...!!