Monday, September 5, 2011

"Tere" Liye

रातों के अंधेरों में, इन उजले सबेरों में,
घनघोर घटाओं में, मदमस्त हवाओं में.
पानी की कल-कल में, चिड़ियों के कलरव में,
संगीत नया है बसा हुआ, इस पूरे मौसम में..!

वो याद पुरानी थी, ये इक नयी कहानी है,
वो बीता बचपन था, ये इक नयी जवानी है.
तब अपने भी दुश्मन थे, अब गैर भी अपने हैं,
कुछ ऐसा मौसम है, कुछ ऐसी रवानी है..!

हर सांस में खुशबू है, मेरी धड़कन बदली है,
एक मस्त परिंदे सी, मेरी चाल भी बहकी है.
ये "तेरा" जादू है, या कोई सुन्दर सपना है,
इन मस्त निगाहों में, अब तो घर अपना है.

अपना ले मुझे, या ठोकर दे, ये "तेरी" मर्ज़ी है,
दीवाना या पागल कह दे मुझे, बस इतनी अर्जी है.

Sunday, August 28, 2011

Hum Badlenge (Be The Change)

एक नया स्वर गूँज रहा है, इस धरती से अम्बर तक.
मिलकर युद्ध करंगे हम, तन में धड़कन है जब तक.

ये युद्ध नहीं है गैरों से, खुद में परिवर्तन करना है.
दृढ निश्चय करना है हमको, जब तक जीवन जीना है.

आज शपथ लेना है हमको, भ्रष्टाचार मिटायेंगे,
कभी किसी को कुछ ना देंगे, कभी ना खुद भी खायेंगे.

कोई नियम नहीं बदलेगा, जब तक हम ना बदलेंगे,
यथास्थिति बनी रहेगी, जब तक हम ना सुधरेंगे.

आज वचन लेते है हम, खुद में परिवर्तन लायेंगे,
आने वाले भारत को, एक नया समाज दिलाएंगे.



"Be the change you want to see in the world.” Mahatma Gandhi

Monday, August 22, 2011

भावनाओ को समझो.....

"भावनाओ को समझो"...ये वाक्य आप सब ने सुना होगा. सुनील पॉल ने, इस एक वाक्य के जरिये सब को बहुत हंसाया है, गुदगुदाया है. सुनने में ये केवल एक साधारण सा वाक्य लगता है परन्तु इसका विश्लेषण करने पर आपको समझ में आएगा की इसके अन्दर कितने गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं. आज मै इसी वाक्य की विवेचना करने जा रहा हूँ.

क्या भावनाओं को समझना इतना आसान है? यदि ऐसा होता और पति-पत्नी (जो की सबसे नजदीकी सम्बन्ध माना जाता है) एक दूसरे की भावनाओं को समझते तो आज इतने "विवाह विच्छेद" (Divorce) नहीं होते. किसी मनुष्य के मन में क्या चल रहा है, इस बात का पता करना लगभग असंभव होता है. जो लोग इस बात का दावा करते हैं की वो सामने बैठे व्यक्ति के मन की बातें पढ़ सकते हैं, वो शायद "पूर्ण सत्य" से बहुत दूर होते हैं.

यदि सह-व्यापार करने वाले लोग एक दूसरे की भावनाओं को समझते तो शायद बने-बनाये व्यापार और सम्बन्ध कभी बिखरते नहीं. जितना आसान है ये कहना की मै सामने वाले का मस्तिष्क पढ़ सकता हूँ, ये उतना ही कठिन है.

परन्तु इतना तो किया ही जा सकता है की, हम किसी व्यक्ति कि भावनाओं को पूरी तरह से समझ सके या नहीं, पर जितना भी हम समझ सके ठेस पहुचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

अंत में मैं एक ही बात बोलना चाहूँगा कि "भावनाओं को समझो"

Monday, August 15, 2011

वन्दे मातरम्

रचयिता: बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

वन्दे मातरम्
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्
शस्य श्यामलाम् मातरम्
शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम्
वन्दे मातरम्

सप्त कोटि कण्ठ कलकल निनाद कराले
निसप्त कोटि भुजैर्ध्रुत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम्
वन्दे मातरम्

तुमि विद्या तुमि धर्म,तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति
हृदये तुमि मा भक्ति
तोमारै प्रतिमा गडि मंदिरे मंदिरे
वन्दे मातरम्

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्
सुजलाम् सुफलाम् मातरम्
वन्दे मातरम्

श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भूषिताम्
धरणीम् भरणीम् मातरम्
वन्दे मातरम्

Tuesday, August 2, 2011

सन्नाटे की आवाज़ !!

मै बहुत दिन से ये जानने का प्रयास कर रहा था की क्या सन्नाटे की भी कोई आवाज़ होती है, शायद नहीं, या शायद नहीं होती थी. पर अब वक़्त बदल चुका है! वो गलियां जो हमेशा सन्नाटे में होती थी, पिछले कुछ दिनों में इतने अत्याचार देखें हैं की उनका भी मन द्रवित हो चुका है और वो भी कुछ कहने पर मजबूर हो गयी है. प्रमुखतः ये अत्याचार महिलाओं के ऊपर हुए हैं:

कल गुजर रहा था उसी रस्ते पर मैं,
रात की काली छाया भी पूरे शबाब पे थी,
कुछ झींगुरों की आवाज़ कानों में पड़ रही थी मेरे,
ऐसा लगा इस सन्नाटे की एक आवाज़ भी थी.

कुछ कहना था उसको मुझसे,
शायद, कुछ बात करनी थी,
पर मै थोडा हत्भ्रमित था,
क्या सन्नाटे की भी आवाज़ होती है.

खैर जो भी है, एक कवि के नाते मैंने सुनना स्वीकार किया,
उन अन-सुनी अन-कही बातों पर चिंतन करने का विचार किया,
जो कहा उन्होंने उस पल में, झिंझोड़ दिया मेरे मन को,
अब उनकी ही बातों को मैंने, एक कविता का सारांश दिया: - - -

"जिनकी उजली शक्लें दिन में खूब चमकती हैं,
रातों के सन्नाटे में काली करतूतें करती हैं,
दिन में जितने भाषण दे लें, एक सुन्दर भविष्य बनाने का,
रात के अँधेरे में उस भविष्य का ही शोषण करती हैं.

जिन रस्तों पर दिन का सूरज खूब उजाला देता है,
उन रस्तों पर रातों में एक घना अँधेरा होता है,
जिनके हँसते चेहरों पर हम दिन में वारे न्यारे जाते हैं
रातों में उनकी दारुण चीखों से ये रस्ते भर जाते है.

इन चीखों से तो ये सन्नाटे भी अब घबराते हैं,
तुम लोगो को शायद कुछ ना हो पर सन्नाटे भी अब चिल्लाते हैं."

Wednesday, June 1, 2011

उपवास

मैंने बचपन में देखा था, माँ को उपवास करते,
कारण था, बेटे का अच्छा स्वास्थ्य, पति की उन्नति और परिवार की ख़ुशी.

आज कल भी लोग उपवास कर रहे हैं,
कुछ टीवी के सामने तो कुछ समाचार पत्र में प्रचार कर.

उद्देश्य उनका है देश का विकास और जनता की भलाई!!
परन्तु क्या सच में यही कारण है उनके उपवास का? 

थोडा मनन और चिंतन के बाद एक अनूठा तथ्य सामने आया,
जिसने मेरे दिमाग के नसों को थोडा हिलाया.

दुकाने नहीं चल रही थी कुछ ठेकेदारों की,
जेबें खाली हो रहीं थी इन बेचारों की.

इन्होने सोचा, गाँधी के विचारों को बैसाखी बनाते हैं,
लोगों को अपने राजनैतिक भंवर जाल में फसांते हैं.
एक अच्छे व्यक्ति के नाम का सहारा लेकर,
चलो जनता को फिर से मूर्ख बनाते हैं.

कुछ ऐसा ही हो रहा है इस देश में आजकल,
चारो तरफ मच रही है उपवास की हलचल.
आप को भी यदि मनवानी हैं अपनी कुछ मांगें,
शुरू कर दीजिये उपवास बाकी सारे प्रयास छोड़ कर.

कोई तो सुनेगा आपकी मांग, आकर देगा कुछ तो आश्वासन,
काम हो या ना हो आपका, वृहद् रूप से होगा आपके नाम का प्रसारण.

Friday, May 6, 2011

प्रकृति (Nature)

कितनी अच्छी नदियाँ हैं, कल कल कर के बहती हैं,
चिड़ियों की आवाजें भी, कैसा जादू करती हैं.

पर्वत पर सूरज निकला है, किरने छन कर आती हैं,
पेड़ों के पत्तों से मिल कर, सुन्दर छवि बनाती हैं.

पत्तों पर ये ओस की बूंदे, मोती जैसी लगती हैं,
फूलों की खूशबू भी देखो, कितनी प्यारी लगती है.

हरियाली खेतों में छाई, फसलें खड़ी लहलहाती हैं,
गेहूं की बालें भी देखो, मधुर संगीत सुनाती हैं.


इस कविता का एक यथोचित अंत करने का प्रयास काफी दिनों से कर रहा हूँ, पर नहीं हो पा रहा है. इसलिए इसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ, आपके सुझाव के लिए.

Wednesday, May 4, 2011

सरकारी विद्यालय (Government School)

दादी:
हुआ सबेरा, चिड़ियाँ आई, एक अनोखी घटा है छाई,
'आलस छोडो अब उठ जाओ', दादी ने आवाज़ लगायी.

सुबह सवरे जो उठते हैं, उनके दिन अच्छे होते हैं,
तुम भी देखो अब उठ जाओ, ऐसे ना, बच्चे रोते हैं.

समय हो गया विद्यालय का, सारे बच्चे जाते हैं,
तुम भी जल्दी से आ जाओ, वर्ना मास्टर आते हैं.

पोता:
दादी तुम कितनी अच्छी हो, मुझे रोज जगाती हो,
इतनी जल्दी मुझे संवार के, विद्यालय भगाती हो.

पर तुमको क्या बतलाऊं, वहां की क्या कहानी है,
मास्टर जी तो खैनी बनाते, स्वेटर बुनती मास्टरानी हैं.

सारे बच्चे खूब खेलते, मास्टर नहीं पढ़ाते हैं,
जब भी कोई पूछे उनसे, डांट-२ कर भगाते हैं.


इसीलिए तो मैं सोता हूँ, मुझे अभी ना उठना है,
ऐसा ही है यदि विद्यालय तो, वहां जा कर क्या करना है?

Saturday, April 30, 2011

दिल्ली और मै...

आज कल लिखने का भूत लगा हुआ है मुझे, ऐसा लग रहा है चोरी ना हो गयी किसीने मेरी बोरियत चुरा ली हो (ज्यादा जानने के लिए पढ़े मेरा पिछला लेख). मेरा ये लेख उन दिनों के बारे में है जब मै पहली बार दिल्ली आया था.

मेरे मामा AIIMS में काम करते थे (अब वो इस दुनिया में नहीं है), मै अपनी माँ के साथ पहली बार दिल्ली आया था शायद १९८८ - १९८९ में. मेरी उम्र कुछ ५ या ६ साल की थी. हे भगवान इतनी गाड़ियाँ, चारों तरफ सड़के, दुकाने...बाप रे बाप. मै डर गया और मुझे याद है मैंने माँ का आँचल नहीं छोड़ा. हम लोग मामा के घर पहुचे जो की सरोजनी नगर में था, मुझे लगा शायद ये घर का बरामदा है, क्यूंकि हमारे गाँव में तो इतनी जगह तो गाय बाँधने के ही उपयोग में आती थी. पर अब समझ में आता है की इतने बड़े शहर में हमारी परिस्थिति इंसानों जैसी तो कतई नहीं है; खैर इस बात को हम बाद में चर्चा में लायेंगे. अभी आप इतना समझ सकते है की इस शहर का पहला प्रभाव मेरे ऊपर कुछ अच्छा नहीं था.

अगले १-२ महीने मै दिल्ली में था; मै एक दिन अपने मामा के साथ उनके ऑफिस गया, वहां एक अजीब घटना हुयी, मामा ने एक कांच की बोतल पकड़ाया मुझे और पीने के लिए कहा...आम का स्वाद..मै अचम्भे में पड़ गया, बोतल के अन्दर आम, असंभव सा लग रहा था मुझे, और ऐसा भी लग रहा था जैसे ये कोई जादू हो, पर ऐसा नहीं था दोस्तों, वो था मेरा पहला अनुभव maaza पीने का. और ये वो अनुभव था जिसने मेरा ये विश्वास और भी पक्का कर दिया कि घर के आकार के अलावां और भी बहुत सारी असमानताएं है गाँव और शहर के बीच में, क्योंकि गाँव में कभी भी कोई आम बोतल में बंद करके नहीं पीता.

खैर जो भी हो, बड़ा ही दिलचस्प समय था वो, बहुत सारी अनोखी घटनाएं हुईं मेरे साथ. एक दिन मेरे बड़े भाई (मामा के लड़के) ने बोला की हम पार्क जा रहे हैं, अब ये कौन सी नयी बला है, जब हम वहां पहुचे तो ऐसा लगा की २-४ गाँव के लोग अपने परिवार वालों के साथ आ गए है, जैसे हमारे यहाँ बाढ़ के समय होता है, सब लोग अपने घर बार छोड़ कर कहीं सुरक्षित स्थान पर आ जाते हैं. मैंने पूछा तो मेरे भाई ने बताया, लोग शाम के समय साफ़ हवा लेने आते हैं, क्या बात है भाई, इस मामले में भी गाँव और शहर अलग है. यहाँ पर तकनीक कितनी उन्नत है, लोग हवा को भी बांध कर रख सकते है, गाँव में तो खुली हवा बेचारी हर जगह घूमती रहती है और कोई उसे पूछता भी नहीं.

और भी बहुत कुछ हुआ जिसने मेरे दिमाग को झकझोड़ के रख दिया था, पर उन सारी बातों के बारे में आपको नहीं बताऊंगा. मैं बस इतना कहना चाहूँगा की मेरा पहला अनुभव मिश्रित था जहाँ कुछ बातों ने मुझमे कौतुहल जगाया, वहीँ कुछ बातों ने डर भी पैदा किया. मैंने उसी समय सोचा था की कुछ भी हो जाए मै अपना गाँव छोड़ कर नहीं जाऊंगा. पर लोग सच कहते है बचपन के सपने हमेशा सच नहीं हुआ करते और बाद में जब मैंने "राहुल संकृत्यायन" को पढ़ा तो लगा घूमने के बिना ज्ञान नहीं बढ़ता. आज मै भारत देश के करीब २७ राज्यों एवं केंद्र शाशित प्रदेशों की यात्रा कर चुका हूँ और बहुत कुछ सीखने के लिए मिला है मुझे.

आज मै पिछले ३ साल से दिल्ली में रह रहा हूँ, कुछ अच्छी तो कुछ 'कम अच्छी' घटनाएं हुई मेरे साथ और मै शायद इस शहर को अभी भी पूरी तरह से पसंद नहीं कर पाया हूँ. पता नहीं क्यों अब भी एक अजीब सा डर लगता है मुझे. ऐसा लगता है हर किसी को समय से आगे निकलना है, क्षितिज से आगे पहुचना है और एक दिन में २४ घंटे से ज्यादा पैदा करना है. पर जो भी हो मैं भारत देश की राजधानी में रहता हूँ और मुझे खुश रहना चाहिए.

Thursday, April 28, 2011

ताकि आप ये न कहें की और चोरी हो गयी....!!

देखिये हमारे इस लेख के शीर्षक पर मत जाईये, ये तो केवल आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए रखा गया है. परन्तु मै झूठ कदापि नहीं बोल रहा हूँ, हाँ चोरी हो गयी और वो भी दिन दहाड़े.. किसी को कानो कान पता भी नहीं चला. चलिए आपको मै ज्यादा संदेह में ना रखते हुए, पूरी कहानी बताता हूँ.

कल (April 27, 2011) मै जब ऑफिस से घर पंहुचा तो देखा मेरे घर के अन्दर लाइट जल रही है और प्रकाश आ रहा है, मुझे लगा कि संदीप (मै और संदीप साथ रहते हैं) घर के अन्दर होगा. परन्तु जब मैंने नजदीक जा कर देखा तो मेरी ऑंखें खुली रह गयी...ये तो चोरी हो गयी.... घर का ताला टूटा हुआ...सारा सामान जमीन (तीसरी मंजिल के फर्श को भी मै जमीन बोल रहा हूँ) पर फैला हुआ था. कपड़ो की दशा तो ऐसी लग रही थी जैसे किसी अंतरराष्ट्रीय पहलवान ने कपडे जमीन पर फैला कर कुश्ती लड़ी हो. मेरे तो होश उड़ गए, ये क्या हो गया भगवान, मै अभी यही सोच रहा था कि तब तक मेरी नजर कोने में रखे छोटे स्टूल की तरफ गयी जहाँ पर मेरा नया, छोटा सा, प्यारा सा टीवी रखा होता था. ये वही टीवी था जिसको हमने वर्ल्ड कप देखने के लिए खरीदा था..वो अब वहां नहीं था..थी तो वो खाली जगह जहा मेरा टीवी रखा होता था, रिमोट भी नहीं छोड़ा था कमबख्तों ने.

फिर मैंने सोचा कि, क्या ये चोर केवल टीवी लेने आया था, इसके लिए उसने इतनी मेहनत कि...मैं सदमे से थोडा बाहर निकल  रहा था और मेरा दिमाग धीरे-२ चल रहा था, कपड़ो की दशा साफ़ बता रही थी की जरूर चोर भाई साहब ने हर कोने में कुछ कीमती सामन ढूँढने की कोशिश कि है, पर हम कंगालों के पास उनको पता नहीं था कि कुछ भी नहीं मिलने वाला. पर उन्होंने चोरी तो कि और कुछ ऐसा ले गए शायद जिसे वो अपनी पूरी जिंदगी में नहीं कमा पाए थे, मेरे सर्टिफिकेट व मार्क शीट..मुझे ऐसा लग रहा है कि चोरों को पढाई का बहुत शौक था, इसलिए वो मेरे कागजात लेकर गए, नहीं तो कुछ ज्यादा कपडे ही लेकर चले जाते.

अब मै आपको क्या बताऊँ, नया-२ इतर (deodorant) खरीदा था, जालिमों ने वो भी नहीं छोड़ा. आज जब मै थोडा फ्री बैठा हूँ तो कुछ विश्लेषण करने का विचार हुआ: चोर तीन चीजें लेकर गया १- टीवी (छोटा सा, प्यारा सा) २- मेरे कागजात एवं ३- इतर. चोर कोई आज के ज़माने का पढने वाला क्रिकेट प्रेमी था. तभी तो उसने ये चीजें चुराईं.

अब जो भी हो टूटा दरवाजा मुझे घूर रहा था और बोल रहा था कि "तुम्हारे घर में चोरी हो गई..., किसीने तुम्हारे दुनिया में अतिक्रमण कर दिया और तुम कुछ नहीं कर पाए". ऐसा नहीं है मैंने कुछ नहीं किया, पुलिस को बुलाया, शिकायत दर्ज कि और मै आपको बताऊँ, जब मै दिल्ली पुलिस से मिला तो उनका व्यहार देखकर मै चोरी को भूल ही गया. मुझे पता ही नहीं था की पुलिस वाले इतने प्यार से बात करते हैं. जी मुझको भी पता था कि मेरा सामान नहीं मिलने वाला है, पर जितने प्यार से उन्होंने ये बात मुझे बताई, मै तो सब कुछ भूल गया. दिल्ली पुलिस जिंदाबाद.

अब जी ऐसा है कि मैंने दरवाजा ठीक करवा लिया है, आज मै ऑफिस भी नहीं गया था, चोर ने हमारी जिंदगी दो-चार दिन के लिए बदल दी है, आज एक बात और समझ में आई कि लाइफ में चोरी होने कि सूरत में हालात से लड़ने के लिए प्लानिंग जरूर होनी चाहिए. इसीलिए मैंने एक पुलिस वाले से दोस्ती बढ़ा ली है, भई कम से कम रिपोर्ट लिखाने में तकलीफ तो नहीं होगी, सामान तो वैसे भी नहीं मिलना है.

तो दोस्तों अपने ताले और दरवाजे एक बार और ध्यान से देख लीजिये क्यूंकि मेरे यहाँ तो चोरी हो गयी. :(

वो आये मेरी ज़िन्दगी में इस तरह , कि हालात बदल गए.
लुट गयी दुनिया मेरी, और मेरे खयालात बदल गए.

Thursday, March 24, 2011

Pain

बहुत कठिन पल भी आते हैं जीवन में,
ऐसा लगता है सब कुछ थम सा गया है,
एक अँधेरा सा दिखाई देता है सामने,
और मानो रक्त जम सा गया है.

कुछ ऐसा ही दौर गुजरा मेरे भी संग,
लग रहा था ख़त्म हो गयी है उमंग,
दर्द का कोई ग़म नहीं था मुझे,
गिला था बस रब से की, क्यूँ मेरे ही संग?

ऐसा लगा प्रगति की राह थम सी जायेगी,
जिंदगी अब कभी ना पटरी पर आएगी,
सब कुछ उजड़ा सा लग रहा था सामने,
और ऐसा लगता था की उम्मीद भी टूट जायेगी.

पर अब ऐसा लगता है,
सब कुछ जीवन का एक हिस्सा है,
दर्द केवल "दर्द" का एहसास नहीं,
बल्कि हमारी जिंदगी का एक किस्सा है.

हर वक़्त सब कुछ सुनहरा नहीं होता,
ख़ुशी का रंग हमेशा गहरा नहीं होता,
लड़ने की उम्मीद बरकरार रखो,
क्यूंकि गम का हमेशा पहरा नहीं होता.