Saturday, April 30, 2011

दिल्ली और मै...

आज कल लिखने का भूत लगा हुआ है मुझे, ऐसा लग रहा है चोरी ना हो गयी किसीने मेरी बोरियत चुरा ली हो (ज्यादा जानने के लिए पढ़े मेरा पिछला लेख). मेरा ये लेख उन दिनों के बारे में है जब मै पहली बार दिल्ली आया था.

मेरे मामा AIIMS में काम करते थे (अब वो इस दुनिया में नहीं है), मै अपनी माँ के साथ पहली बार दिल्ली आया था शायद १९८८ - १९८९ में. मेरी उम्र कुछ ५ या ६ साल की थी. हे भगवान इतनी गाड़ियाँ, चारों तरफ सड़के, दुकाने...बाप रे बाप. मै डर गया और मुझे याद है मैंने माँ का आँचल नहीं छोड़ा. हम लोग मामा के घर पहुचे जो की सरोजनी नगर में था, मुझे लगा शायद ये घर का बरामदा है, क्यूंकि हमारे गाँव में तो इतनी जगह तो गाय बाँधने के ही उपयोग में आती थी. पर अब समझ में आता है की इतने बड़े शहर में हमारी परिस्थिति इंसानों जैसी तो कतई नहीं है; खैर इस बात को हम बाद में चर्चा में लायेंगे. अभी आप इतना समझ सकते है की इस शहर का पहला प्रभाव मेरे ऊपर कुछ अच्छा नहीं था.

अगले १-२ महीने मै दिल्ली में था; मै एक दिन अपने मामा के साथ उनके ऑफिस गया, वहां एक अजीब घटना हुयी, मामा ने एक कांच की बोतल पकड़ाया मुझे और पीने के लिए कहा...आम का स्वाद..मै अचम्भे में पड़ गया, बोतल के अन्दर आम, असंभव सा लग रहा था मुझे, और ऐसा भी लग रहा था जैसे ये कोई जादू हो, पर ऐसा नहीं था दोस्तों, वो था मेरा पहला अनुभव maaza पीने का. और ये वो अनुभव था जिसने मेरा ये विश्वास और भी पक्का कर दिया कि घर के आकार के अलावां और भी बहुत सारी असमानताएं है गाँव और शहर के बीच में, क्योंकि गाँव में कभी भी कोई आम बोतल में बंद करके नहीं पीता.

खैर जो भी हो, बड़ा ही दिलचस्प समय था वो, बहुत सारी अनोखी घटनाएं हुईं मेरे साथ. एक दिन मेरे बड़े भाई (मामा के लड़के) ने बोला की हम पार्क जा रहे हैं, अब ये कौन सी नयी बला है, जब हम वहां पहुचे तो ऐसा लगा की २-४ गाँव के लोग अपने परिवार वालों के साथ आ गए है, जैसे हमारे यहाँ बाढ़ के समय होता है, सब लोग अपने घर बार छोड़ कर कहीं सुरक्षित स्थान पर आ जाते हैं. मैंने पूछा तो मेरे भाई ने बताया, लोग शाम के समय साफ़ हवा लेने आते हैं, क्या बात है भाई, इस मामले में भी गाँव और शहर अलग है. यहाँ पर तकनीक कितनी उन्नत है, लोग हवा को भी बांध कर रख सकते है, गाँव में तो खुली हवा बेचारी हर जगह घूमती रहती है और कोई उसे पूछता भी नहीं.

और भी बहुत कुछ हुआ जिसने मेरे दिमाग को झकझोड़ के रख दिया था, पर उन सारी बातों के बारे में आपको नहीं बताऊंगा. मैं बस इतना कहना चाहूँगा की मेरा पहला अनुभव मिश्रित था जहाँ कुछ बातों ने मुझमे कौतुहल जगाया, वहीँ कुछ बातों ने डर भी पैदा किया. मैंने उसी समय सोचा था की कुछ भी हो जाए मै अपना गाँव छोड़ कर नहीं जाऊंगा. पर लोग सच कहते है बचपन के सपने हमेशा सच नहीं हुआ करते और बाद में जब मैंने "राहुल संकृत्यायन" को पढ़ा तो लगा घूमने के बिना ज्ञान नहीं बढ़ता. आज मै भारत देश के करीब २७ राज्यों एवं केंद्र शाशित प्रदेशों की यात्रा कर चुका हूँ और बहुत कुछ सीखने के लिए मिला है मुझे.

आज मै पिछले ३ साल से दिल्ली में रह रहा हूँ, कुछ अच्छी तो कुछ 'कम अच्छी' घटनाएं हुई मेरे साथ और मै शायद इस शहर को अभी भी पूरी तरह से पसंद नहीं कर पाया हूँ. पता नहीं क्यों अब भी एक अजीब सा डर लगता है मुझे. ऐसा लगता है हर किसी को समय से आगे निकलना है, क्षितिज से आगे पहुचना है और एक दिन में २४ घंटे से ज्यादा पैदा करना है. पर जो भी हो मैं भारत देश की राजधानी में रहता हूँ और मुझे खुश रहना चाहिए.

Thursday, April 28, 2011

ताकि आप ये न कहें की और चोरी हो गयी....!!

देखिये हमारे इस लेख के शीर्षक पर मत जाईये, ये तो केवल आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए रखा गया है. परन्तु मै झूठ कदापि नहीं बोल रहा हूँ, हाँ चोरी हो गयी और वो भी दिन दहाड़े.. किसी को कानो कान पता भी नहीं चला. चलिए आपको मै ज्यादा संदेह में ना रखते हुए, पूरी कहानी बताता हूँ.

कल (April 27, 2011) मै जब ऑफिस से घर पंहुचा तो देखा मेरे घर के अन्दर लाइट जल रही है और प्रकाश आ रहा है, मुझे लगा कि संदीप (मै और संदीप साथ रहते हैं) घर के अन्दर होगा. परन्तु जब मैंने नजदीक जा कर देखा तो मेरी ऑंखें खुली रह गयी...ये तो चोरी हो गयी.... घर का ताला टूटा हुआ...सारा सामान जमीन (तीसरी मंजिल के फर्श को भी मै जमीन बोल रहा हूँ) पर फैला हुआ था. कपड़ो की दशा तो ऐसी लग रही थी जैसे किसी अंतरराष्ट्रीय पहलवान ने कपडे जमीन पर फैला कर कुश्ती लड़ी हो. मेरे तो होश उड़ गए, ये क्या हो गया भगवान, मै अभी यही सोच रहा था कि तब तक मेरी नजर कोने में रखे छोटे स्टूल की तरफ गयी जहाँ पर मेरा नया, छोटा सा, प्यारा सा टीवी रखा होता था. ये वही टीवी था जिसको हमने वर्ल्ड कप देखने के लिए खरीदा था..वो अब वहां नहीं था..थी तो वो खाली जगह जहा मेरा टीवी रखा होता था, रिमोट भी नहीं छोड़ा था कमबख्तों ने.

फिर मैंने सोचा कि, क्या ये चोर केवल टीवी लेने आया था, इसके लिए उसने इतनी मेहनत कि...मैं सदमे से थोडा बाहर निकल  रहा था और मेरा दिमाग धीरे-२ चल रहा था, कपड़ो की दशा साफ़ बता रही थी की जरूर चोर भाई साहब ने हर कोने में कुछ कीमती सामन ढूँढने की कोशिश कि है, पर हम कंगालों के पास उनको पता नहीं था कि कुछ भी नहीं मिलने वाला. पर उन्होंने चोरी तो कि और कुछ ऐसा ले गए शायद जिसे वो अपनी पूरी जिंदगी में नहीं कमा पाए थे, मेरे सर्टिफिकेट व मार्क शीट..मुझे ऐसा लग रहा है कि चोरों को पढाई का बहुत शौक था, इसलिए वो मेरे कागजात लेकर गए, नहीं तो कुछ ज्यादा कपडे ही लेकर चले जाते.

अब मै आपको क्या बताऊँ, नया-२ इतर (deodorant) खरीदा था, जालिमों ने वो भी नहीं छोड़ा. आज जब मै थोडा फ्री बैठा हूँ तो कुछ विश्लेषण करने का विचार हुआ: चोर तीन चीजें लेकर गया १- टीवी (छोटा सा, प्यारा सा) २- मेरे कागजात एवं ३- इतर. चोर कोई आज के ज़माने का पढने वाला क्रिकेट प्रेमी था. तभी तो उसने ये चीजें चुराईं.

अब जो भी हो टूटा दरवाजा मुझे घूर रहा था और बोल रहा था कि "तुम्हारे घर में चोरी हो गई..., किसीने तुम्हारे दुनिया में अतिक्रमण कर दिया और तुम कुछ नहीं कर पाए". ऐसा नहीं है मैंने कुछ नहीं किया, पुलिस को बुलाया, शिकायत दर्ज कि और मै आपको बताऊँ, जब मै दिल्ली पुलिस से मिला तो उनका व्यहार देखकर मै चोरी को भूल ही गया. मुझे पता ही नहीं था की पुलिस वाले इतने प्यार से बात करते हैं. जी मुझको भी पता था कि मेरा सामान नहीं मिलने वाला है, पर जितने प्यार से उन्होंने ये बात मुझे बताई, मै तो सब कुछ भूल गया. दिल्ली पुलिस जिंदाबाद.

अब जी ऐसा है कि मैंने दरवाजा ठीक करवा लिया है, आज मै ऑफिस भी नहीं गया था, चोर ने हमारी जिंदगी दो-चार दिन के लिए बदल दी है, आज एक बात और समझ में आई कि लाइफ में चोरी होने कि सूरत में हालात से लड़ने के लिए प्लानिंग जरूर होनी चाहिए. इसीलिए मैंने एक पुलिस वाले से दोस्ती बढ़ा ली है, भई कम से कम रिपोर्ट लिखाने में तकलीफ तो नहीं होगी, सामान तो वैसे भी नहीं मिलना है.

तो दोस्तों अपने ताले और दरवाजे एक बार और ध्यान से देख लीजिये क्यूंकि मेरे यहाँ तो चोरी हो गयी. :(

वो आये मेरी ज़िन्दगी में इस तरह , कि हालात बदल गए.
लुट गयी दुनिया मेरी, और मेरे खयालात बदल गए.