Friday, May 6, 2011

प्रकृति (Nature)

कितनी अच्छी नदियाँ हैं, कल कल कर के बहती हैं,
चिड़ियों की आवाजें भी, कैसा जादू करती हैं.

पर्वत पर सूरज निकला है, किरने छन कर आती हैं,
पेड़ों के पत्तों से मिल कर, सुन्दर छवि बनाती हैं.

पत्तों पर ये ओस की बूंदे, मोती जैसी लगती हैं,
फूलों की खूशबू भी देखो, कितनी प्यारी लगती है.

हरियाली खेतों में छाई, फसलें खड़ी लहलहाती हैं,
गेहूं की बालें भी देखो, मधुर संगीत सुनाती हैं.


इस कविता का एक यथोचित अंत करने का प्रयास काफी दिनों से कर रहा हूँ, पर नहीं हो पा रहा है. इसलिए इसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ, आपके सुझाव के लिए.

Wednesday, May 4, 2011

सरकारी विद्यालय (Government School)

दादी:
हुआ सबेरा, चिड़ियाँ आई, एक अनोखी घटा है छाई,
'आलस छोडो अब उठ जाओ', दादी ने आवाज़ लगायी.

सुबह सवरे जो उठते हैं, उनके दिन अच्छे होते हैं,
तुम भी देखो अब उठ जाओ, ऐसे ना, बच्चे रोते हैं.

समय हो गया विद्यालय का, सारे बच्चे जाते हैं,
तुम भी जल्दी से आ जाओ, वर्ना मास्टर आते हैं.

पोता:
दादी तुम कितनी अच्छी हो, मुझे रोज जगाती हो,
इतनी जल्दी मुझे संवार के, विद्यालय भगाती हो.

पर तुमको क्या बतलाऊं, वहां की क्या कहानी है,
मास्टर जी तो खैनी बनाते, स्वेटर बुनती मास्टरानी हैं.

सारे बच्चे खूब खेलते, मास्टर नहीं पढ़ाते हैं,
जब भी कोई पूछे उनसे, डांट-२ कर भगाते हैं.


इसीलिए तो मैं सोता हूँ, मुझे अभी ना उठना है,
ऐसा ही है यदि विद्यालय तो, वहां जा कर क्या करना है?