Sunday, August 28, 2011

Hum Badlenge (Be The Change)

एक नया स्वर गूँज रहा है, इस धरती से अम्बर तक.
मिलकर युद्ध करंगे हम, तन में धड़कन है जब तक.

ये युद्ध नहीं है गैरों से, खुद में परिवर्तन करना है.
दृढ निश्चय करना है हमको, जब तक जीवन जीना है.

आज शपथ लेना है हमको, भ्रष्टाचार मिटायेंगे,
कभी किसी को कुछ ना देंगे, कभी ना खुद भी खायेंगे.

कोई नियम नहीं बदलेगा, जब तक हम ना बदलेंगे,
यथास्थिति बनी रहेगी, जब तक हम ना सुधरेंगे.

आज वचन लेते है हम, खुद में परिवर्तन लायेंगे,
आने वाले भारत को, एक नया समाज दिलाएंगे.



"Be the change you want to see in the world.” Mahatma Gandhi

Monday, August 22, 2011

भावनाओ को समझो.....

"भावनाओ को समझो"...ये वाक्य आप सब ने सुना होगा. सुनील पॉल ने, इस एक वाक्य के जरिये सब को बहुत हंसाया है, गुदगुदाया है. सुनने में ये केवल एक साधारण सा वाक्य लगता है परन्तु इसका विश्लेषण करने पर आपको समझ में आएगा की इसके अन्दर कितने गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं. आज मै इसी वाक्य की विवेचना करने जा रहा हूँ.

क्या भावनाओं को समझना इतना आसान है? यदि ऐसा होता और पति-पत्नी (जो की सबसे नजदीकी सम्बन्ध माना जाता है) एक दूसरे की भावनाओं को समझते तो आज इतने "विवाह विच्छेद" (Divorce) नहीं होते. किसी मनुष्य के मन में क्या चल रहा है, इस बात का पता करना लगभग असंभव होता है. जो लोग इस बात का दावा करते हैं की वो सामने बैठे व्यक्ति के मन की बातें पढ़ सकते हैं, वो शायद "पूर्ण सत्य" से बहुत दूर होते हैं.

यदि सह-व्यापार करने वाले लोग एक दूसरे की भावनाओं को समझते तो शायद बने-बनाये व्यापार और सम्बन्ध कभी बिखरते नहीं. जितना आसान है ये कहना की मै सामने वाले का मस्तिष्क पढ़ सकता हूँ, ये उतना ही कठिन है.

परन्तु इतना तो किया ही जा सकता है की, हम किसी व्यक्ति कि भावनाओं को पूरी तरह से समझ सके या नहीं, पर जितना भी हम समझ सके ठेस पहुचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

अंत में मैं एक ही बात बोलना चाहूँगा कि "भावनाओं को समझो"

Monday, August 15, 2011

वन्दे मातरम्

रचयिता: बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

वन्दे मातरम्
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्
शस्य श्यामलाम् मातरम्
शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम्
वन्दे मातरम्

सप्त कोटि कण्ठ कलकल निनाद कराले
निसप्त कोटि भुजैर्ध्रुत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम्
वन्दे मातरम्

तुमि विद्या तुमि धर्म,तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति
हृदये तुमि मा भक्ति
तोमारै प्रतिमा गडि मंदिरे मंदिरे
वन्दे मातरम्

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्
सुजलाम् सुफलाम् मातरम्
वन्दे मातरम्

श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भूषिताम्
धरणीम् भरणीम् मातरम्
वन्दे मातरम्

Tuesday, August 2, 2011

सन्नाटे की आवाज़ !!

मै बहुत दिन से ये जानने का प्रयास कर रहा था की क्या सन्नाटे की भी कोई आवाज़ होती है, शायद नहीं, या शायद नहीं होती थी. पर अब वक़्त बदल चुका है! वो गलियां जो हमेशा सन्नाटे में होती थी, पिछले कुछ दिनों में इतने अत्याचार देखें हैं की उनका भी मन द्रवित हो चुका है और वो भी कुछ कहने पर मजबूर हो गयी है. प्रमुखतः ये अत्याचार महिलाओं के ऊपर हुए हैं:

कल गुजर रहा था उसी रस्ते पर मैं,
रात की काली छाया भी पूरे शबाब पे थी,
कुछ झींगुरों की आवाज़ कानों में पड़ रही थी मेरे,
ऐसा लगा इस सन्नाटे की एक आवाज़ भी थी.

कुछ कहना था उसको मुझसे,
शायद, कुछ बात करनी थी,
पर मै थोडा हत्भ्रमित था,
क्या सन्नाटे की भी आवाज़ होती है.

खैर जो भी है, एक कवि के नाते मैंने सुनना स्वीकार किया,
उन अन-सुनी अन-कही बातों पर चिंतन करने का विचार किया,
जो कहा उन्होंने उस पल में, झिंझोड़ दिया मेरे मन को,
अब उनकी ही बातों को मैंने, एक कविता का सारांश दिया: - - -

"जिनकी उजली शक्लें दिन में खूब चमकती हैं,
रातों के सन्नाटे में काली करतूतें करती हैं,
दिन में जितने भाषण दे लें, एक सुन्दर भविष्य बनाने का,
रात के अँधेरे में उस भविष्य का ही शोषण करती हैं.

जिन रस्तों पर दिन का सूरज खूब उजाला देता है,
उन रस्तों पर रातों में एक घना अँधेरा होता है,
जिनके हँसते चेहरों पर हम दिन में वारे न्यारे जाते हैं
रातों में उनकी दारुण चीखों से ये रस्ते भर जाते है.

इन चीखों से तो ये सन्नाटे भी अब घबराते हैं,
तुम लोगो को शायद कुछ ना हो पर सन्नाटे भी अब चिल्लाते हैं."