Tuesday, August 2, 2011

सन्नाटे की आवाज़ !!

मै बहुत दिन से ये जानने का प्रयास कर रहा था की क्या सन्नाटे की भी कोई आवाज़ होती है, शायद नहीं, या शायद नहीं होती थी. पर अब वक़्त बदल चुका है! वो गलियां जो हमेशा सन्नाटे में होती थी, पिछले कुछ दिनों में इतने अत्याचार देखें हैं की उनका भी मन द्रवित हो चुका है और वो भी कुछ कहने पर मजबूर हो गयी है. प्रमुखतः ये अत्याचार महिलाओं के ऊपर हुए हैं:

कल गुजर रहा था उसी रस्ते पर मैं,
रात की काली छाया भी पूरे शबाब पे थी,
कुछ झींगुरों की आवाज़ कानों में पड़ रही थी मेरे,
ऐसा लगा इस सन्नाटे की एक आवाज़ भी थी.

कुछ कहना था उसको मुझसे,
शायद, कुछ बात करनी थी,
पर मै थोडा हत्भ्रमित था,
क्या सन्नाटे की भी आवाज़ होती है.

खैर जो भी है, एक कवि के नाते मैंने सुनना स्वीकार किया,
उन अन-सुनी अन-कही बातों पर चिंतन करने का विचार किया,
जो कहा उन्होंने उस पल में, झिंझोड़ दिया मेरे मन को,
अब उनकी ही बातों को मैंने, एक कविता का सारांश दिया: - - -

"जिनकी उजली शक्लें दिन में खूब चमकती हैं,
रातों के सन्नाटे में काली करतूतें करती हैं,
दिन में जितने भाषण दे लें, एक सुन्दर भविष्य बनाने का,
रात के अँधेरे में उस भविष्य का ही शोषण करती हैं.

जिन रस्तों पर दिन का सूरज खूब उजाला देता है,
उन रस्तों पर रातों में एक घना अँधेरा होता है,
जिनके हँसते चेहरों पर हम दिन में वारे न्यारे जाते हैं
रातों में उनकी दारुण चीखों से ये रस्ते भर जाते है.

इन चीखों से तो ये सन्नाटे भी अब घबराते हैं,
तुम लोगो को शायद कुछ ना हो पर सन्नाटे भी अब चिल्लाते हैं."

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