Monday, August 22, 2011

भावनाओ को समझो.....

"भावनाओ को समझो"...ये वाक्य आप सब ने सुना होगा. सुनील पॉल ने, इस एक वाक्य के जरिये सब को बहुत हंसाया है, गुदगुदाया है. सुनने में ये केवल एक साधारण सा वाक्य लगता है परन्तु इसका विश्लेषण करने पर आपको समझ में आएगा की इसके अन्दर कितने गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं. आज मै इसी वाक्य की विवेचना करने जा रहा हूँ.

क्या भावनाओं को समझना इतना आसान है? यदि ऐसा होता और पति-पत्नी (जो की सबसे नजदीकी सम्बन्ध माना जाता है) एक दूसरे की भावनाओं को समझते तो आज इतने "विवाह विच्छेद" (Divorce) नहीं होते. किसी मनुष्य के मन में क्या चल रहा है, इस बात का पता करना लगभग असंभव होता है. जो लोग इस बात का दावा करते हैं की वो सामने बैठे व्यक्ति के मन की बातें पढ़ सकते हैं, वो शायद "पूर्ण सत्य" से बहुत दूर होते हैं.

यदि सह-व्यापार करने वाले लोग एक दूसरे की भावनाओं को समझते तो शायद बने-बनाये व्यापार और सम्बन्ध कभी बिखरते नहीं. जितना आसान है ये कहना की मै सामने वाले का मस्तिष्क पढ़ सकता हूँ, ये उतना ही कठिन है.

परन्तु इतना तो किया ही जा सकता है की, हम किसी व्यक्ति कि भावनाओं को पूरी तरह से समझ सके या नहीं, पर जितना भी हम समझ सके ठेस पहुचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

अंत में मैं एक ही बात बोलना चाहूँगा कि "भावनाओं को समझो"

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