Thursday, December 19, 2013

आज के "पारस पत्थर" - एक राजनीतिक व्यंग्य

भारत, खास करके दिल्ली, में एक अलग और अच्छे तरीके का राजनीतिक परिवर्तन हो रहा है। इसमें हमारे "आर्यपुत्र" और "पारस पत्थर" जी का सर्वाधिक योगदान है। ये दोनों नाम मेरे दिए हुए कदापि नहीं हैं - तो आप लोगों को जो भी उचित/अनुचित भाषा का प्रयोग करना है वो आप मेरे twitter मित्र पाण्डेय जी के लिए कीजिये ;) ये कविता एक सरल सा हास्य व्यंग्य है, इससे ज्यादा मै नहीं समझाऊंगा क्यूंकि आप सब खुद समझदार हैं, पर अगर कुछ समझ ना आये तो भी आप हंसियेगा अवश्य:

हे बुद्धिमान
हे सत्यवान
तुम ज्ञान कुम्भ
तुम हो महान..................................!

तुम नीति रचयिता
तुम अनुपालक
तुम ही पीड़ित
तुम निर्णायक..................................!

तुम ऊर्जावान
तुम ही प्रकाश
तुम अवरोधक
तुम ही विकास..................................!

तुम सच्चरित्र
ईमानदार
तुम सच्चाई का
महाकाव्य..................................!

मर्यादपुरुष
तुम कल्पवृक्ष
तुम इस पीढ़ी के
अमर पुत्र..................................!

हम मिट्टी हैं
तुम "पारस" हो
हम शोषित
तुम उद्धारक हो..................................!

तुम पाप विनाशक
तुम दुःख हर्ता
"हम निबलों विकलों" के
तुम ही मालिक, कर्ता-धर्ता..................................!

अब तो आओ हे जन-नायक
कुछ नीति बनाओ, सुख-दायक
हम भी विकसे, फलें-फूलें
सरकार चलाओ इस लायक..................................!

हे आर्य-पुत्र, पारस-रतन, सद्भावना से पूर्ण।
जन-अभिलाषा मान कर, ये काम करो सम्पूर्ण.....................................................!

*=*=*=इति=*=*=*

Monday, December 16, 2013

नए भारत का नया इतिहास बना - Remembering 16 Dec 12

कुछ हवा भी सर्द रही होगी
कुछ दर्द भरी आहें भी..!
तुम्हारी चीखों से गूंजी होंगी
वो सुनसान राहें भी.....................!

सुनी होगी तुम्हारी वेदना, पीड़ा
और तुम्हारी कराहें भी..!
तुम्हारे रुदन से, क्या न भीगी होंगी !!!
उन दरिंदों कि निगाहें भी.....................!

चाँद भी थमा होगा, रात भी ठहरी होगी,
शर्मायी होगी, तारों कि रौशनी भी..!
पर रुकी नहीं हैवानियत, और
उन वहशी दरिंदो कि दरिंदगी भी.....................!

उस सुबह शर्म आयी होगी,
सूरज को उगने में भी..!
हवाओं को बहने और
चिड़ियों को चहकने में भी.....................!

फिर एक बड़ा सैलाब आया
भावनाओं का तूफ़ान आया
"निर्भया" तुम्हारे बलिदान* से
सुषुप्त समाज में नव-ज्ञान आया.....................!

पर अब भी 'तुम्हारा' हिसाब बाकी है
इस क्रान्ति का असली पड़ाव बाकी है
सरकार और क़ानून तो बदलते रहेंगे
हमारे विचारों में एक बदलाव बाकी है.....................!

इस लगी चिंगारी को आग बना
अपने इस आंदोलन को सैलाब बना
बदल दे समाज की विचारधारा को
नए भारत का एक नया इतिहास बना.....................!

* I say it "बलिदान"; many people might not agree to it, but a loss of life which shakes up entire society for something could be very well termed as "बलिदान"

Saturday, December 14, 2013

मै और मेरा इलाहाबाद :)

इलाहाबाद....!! कहाँ से शुरू करूँ..… एक ऐसा शहर जो कि मेरे घर से बाहर मेरा पहला बसेरा बना। मुझे बहुत अच्छे से याद है, जुलाई महीने कि वो बादलों से भरी रात, जब अनाज के बोरे और एक बैग लेकर मै अपने बड़े भाई के एक मित्र के साथ, UP Roadway कि बस में इलाहाबाद के लिए रवाना हुआ था।

बात को fast forward करता हूँ क्यूंकि यहाँ मै अपनी भावनात्मक व्यथा का वर्णन नहीं करना चाहता :) इलाहबाद में मै चार साल रहा। बहुत ही सुखद और यादगार सफ़र रहा। सुबह सवेरे जलेबी-दही और कचोरी का सेवन; फिर खुद रोटी-सब्जी या चावल-दाल बनाना (पूरा खाना बनाने का समय कभी रहा नहीं) और फिर college का रास्ता नापना। मंगलवार और शनिवार के दिन "लेटे हुए हनुमान जी" के दर्शन और भी बहुत कुछ..... the list is very long one :)

अपने पूरे प्रवास के दौरान एक बात तो मुझे समझ में आ ही गयी थी कि, पूरे इलाहाबाद कि अर्थव्यवस्था छात्रो के  भरोसे चलती है। और यह बात मै हवा में नहीं बोल रहा हूँ, ऐसा कई बार हुआ है कि मै होली या दीवाली के अवकाश में घर नहीं गया और इलाहबाद कि गलियों में चारो तरफ एक सन्नाटा सा दिखायी देता था।  एक और बात जो बहुत बाद में मुझे दिल्ली आने के बाद समझ में आयी - जो कि काफी दिलचस्प है। मुझे याद है कि इलाहाबाद में हम किसी भी घर में घुस जाते थे किराए का कमरा पता करने के लिए; कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी कि ये lodge है या कोई महल। दिल्ली आने के बाद ये समझ में आया कि अपना प्यारा शहर इलाहबाद कितना सरल तरीके से क्रियान्वित होता था।

पढाई CMP Degree College में हुई जिसको हम सब लोग "चौतरफा मार पीट"  college भी बोलते थे। अब ऐसा नहीं है कि वहाँ पर केवल मार पीट ही होती थी, पर इस बात में अतिशयोक्ति भी नहीं है :). कॉलेज लाइफ बहुत ही अच्छी रही। ख़ास कर मुझे अपने physics के classes बहुत ही पसंद आते थे। Chemistry में बहुत दिलचस्पी नहीं थी पर Chemistry lab में मुझे एक बात बहुत अच्छी लगती थी कि practicals के दौरान ढेर सारे रंगों का एक नज़ारा देखने को मिलता था। जिन लोगों ने इस कॉलेज में पढ़ाई कि है उनको Chemistry lab का एक और महत्व पता है ;) इसकी पीछे वाली दीवाल के पार ही हमारे प्यारे छात्र बंधुओं का आग्नेयास्त्रों के सारे परिक्षण और प्रयोग होते थे।

इतना अच्छा समय गुजारने के बाद मैंने करीब ११ साल पहले ये शहर छोड़ा और अपनी भाग दौड़ में इतना डूब गया कि वापस कभी जाने का मौका नहीं मिला। मन बहुत करता था कि मै एक बार उस धरती को नमन कर के आऊँ जिसके योगदान ने ही मुझे इस मुक़ाम पर पहुचाया है। मेरा सफ़र पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे गाँव से शुरू होकर आज यहाँ तक पंहुचा है तो इसका काफी हद तक श्रेय इलाहाबाद को जाता है।

सौभाग्यवश इस बार, विश्व बैंक के एक मिशन के लिए, मुझे इलाहाबाद और वाराणसी जाने का अवसर मिला। मै इस बात को सुनते ही काफी उत्तेजित हो गया था। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मै कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करुँ। उत्तेजना के साथ दुःख इस बात का था कि मुझे केवल ३-४ घंटे का समय होगा, अपने इस प्यारे शहर को देखने के लिए। हमारी पूरी टीम ने T B Sapru जिला अस्पताल का निरिक्षण किया।  उसके बाद मै पूरी टीम को लेकर "देहाती रसगुल्ला" गया - जो लोग इलाहाबाद से परिचित हैं उन्हें पता होगा कि मै इस शहर कि एक ख़ास चीज का जिक्र कर रहा हूँ। उसके बाद संगम और हनुमान जी के मंदिर का दर्शन। फिर दारागंज कि गलियों का थोड़ा दर्शन और फिर हम निकल पड़े वाराणसी कि ओर :( दुःख हुआ पर ख़ुशी भी कि एक बार फिर उस धरती के दर्शन हुए जो की मेरे रग-रग में बसा हुआ है।

एक बात तो मुझे कहनी पड़ेगी कि मुझे अब भी वो सारी गलियां और सड़के याद थी और अपनी पूरी टीम को शहर दिखाने के बाद काफी इतरा रहा था। मुझे ख़ुशी इस बात कि भी थी कि ये शहर पहले से कहीं ज्यादा साफ़ सुथरा दिखा। बाह्यरूप तो अब भी पुराने जैसा ही था, पर आतंरिक संचालन में  एक व्यवस्था नजर आयी। टी बी सप्रू हॉस्पिटल भी काफी साफ़ सुथरा दिखा जो कि एक सरकारी अस्पताल के हिसाब से काफी अलग एवं सुखद अनुभव था।

अंत में केवल एक ही बात कहना चाहूंगा कि ये शहर एक अलग विचारधारा पर चलता है; मुझे इस शहर से प्यार है और हमेशा रहेगा। इस शहर में - विरोध भी हैं तो एकता भी है - भिन्नता भी है तो समानता भी है - और - घमंड भी है तो सहिष्णुता भी है।

प्रयाग नगरी में सबका स्वागत है :)

Few Short Poems

(1) मेरा वज़ूद 


मैं कहीं खुद को ही छोड़ आया हूँ अब तो वो रास्ता भी याद नहीं बिखरने लगा है अब वजूद मेरा 

मैं कभी जिंदा था, अब याद नहीं



(2) बिछड़ने कि कवायद

this is for one of my friend - writing on his behalf for someone else :)


वो आयी अपने होंठों पे एक मुस्कान लिए हुए
अपनी आँखों में मेरे सपने, मेरे अरमान लिए हुए।।
पर ये क्या..!! ये बिछड़ने कि कवायद तो नहीं .....  ??
हम तो बैठे थे, अपनी मुहब्बत का पैगाम लिए हुए।।


(3) मेरी आवाज़

यूँ तूने भी साथ छोड़ दिया,
कुछ तेरी याद भी जाती नहीं।
अब सुनाये भी तो किसे 'राहुल'

मेरी आवाज़ भी मुझे आती नहीं। 

Sunday, December 1, 2013

साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता: मेरे गाँव कि कहानी

कहाँ से प्रारम्भ करूँ !! मैं एक बहुत ही छोटे से गांव से सम्बन्ध रखता हूँ। जहाँ अब भी लोग १० घंटे से ज्यादा बिजली और प्रमुख सड़क से संपर्क-मार्ग के लिए तरस रहे हैं। पर बच्चे, बड़े या बूढ़ो कि भावनाओं कि उड़ान इन कठिनाइयों से कहीं ऊपर है। पर आज मै अपने गावं कि विशेषता बताने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, पर पृष्टभूमि देना आवश्यक है ताकि आप ये समझ सके कि मै किस जगह के बारे में लिख रहा हूँ। 

आज कल हर तरफ एक ही चर्चा है कि अमुक पार्टी सांप्रदायिक है और अमुक धर्मनिरपेक्ष। अमुक धर्म के लोग दक्षिण-पंथी है तो अमुक वाम-पंथी। परन्तु अब भी मुझे समस्या कि जड़ उस तरह से नहीं समझ में आती जिस तरह से हमारे समाज के बहुत से बुद्धिजीवी समझाने का प्रयास करते हैं - कम से कम मेरे गांव के वातावरण में। 

मेरे गांव में होली का त्यौहार एक अलग तरीके से मनाया जाता है -गांव के केंद्र से जन-मण्डली गाते-बजाते निकलती है और दिन ख़तम होने से पहले सारे घरों पर कम से कम २-५ मिनट का फगुआ (Holi folk song) का कार्यक्रम होता है। पर ये ख़ास बात नहीं हो सकती क्यूंकि यह प्रक्रिया बहुत सारे गांवो में दुहराई जाती है। खास बात यह है कि इस मंडली का प्रमुख ढोलक वादक एक हिन्दू नहीं है और जब तक वो जीवित थे तब तक उनके बिना आये ये प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होती थी।

मुहर्रम का त्यौहार !! बचपन से मुझे इस दिन का एक मात्र आकर्षण हुआ करता था - रंग-बिरंगे ताजियों को देखना और उस जूलुस का हिस्सा बनना जो इसे लेकर  गांव से निकलता था। इस ताजिये को रखने का चबूतरा जिसके घर पर बना है वो एक मुस्लिम नहीं है और वो परिवार उस चबूतरे का पूरा रख-रखाव करता है। बचपन में मेरी माँ, मुझे हिदायत देकर भेजती थी कि मै ताजिये को छू कर आशीर्वाद लेकर आऊं। मुझे और मेरे जैसे बहुत सारे बच्चों को ये पता नहीं होता था कि वहाँ जा कर आशीर्वाद कैसे लेना है, पर हम जाते थे और ताजिये को छू कर अशीतवाद लेते थे। 

लेकिन क्या ये दोनों उदहारण धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता के हैं - ना किसी को तब पता था ना अब (कम से कम मै तो यही सोचता हूँ)

इस देश में धर्म को लेकर इतने दंगे-फसाद हुए, पर उनका कोई ख़ास असर मैंने कभी भी मेरे गांव में नहीं देखा था। लोग समाचार देखते/ पढ़ते थे, राजनीति को कोसते थे और अपने काम पर लग जाते थे। परन्तु इस भावना का धीरे-धीरे ह्रास होता हुआ दिख रहा था। अभी भी मेरे गांव में ऊपर से देखने में सब कुछ पहले जैसा है, पर लगता है कि गांव के दो हिस्सों में सामंजस्य कि कमी हो रही है। 

मै इस बात को नहीं समझ पा रहा हूँ कि जब मेरे गांव में कभी भी कोई दंगा-फसाद नहीं हुआ तो इस बढ़ते वैमनस्य का कारण क्या है? एक सबसे बड़ा कारण मुझे समझ में आता है - तथाकथित 'Main Stream Media (MSM)' कि भूमिका। देश में कहीं कुछ भी बात होती है उसे जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ा  कर इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे कि पूरे देश में दो धर्मो के लोग एक दुसरे के खून के प्यासे हैं। आज कल Digital TV के आगमन से MSM का प्रवेश लगभग गांव के हर घर में हो गया है और ऐसे ख़बरों का और इनके अंदर छिपी वैमनस्य कि भावनाओं का प्रचार बहुत ही वृहद् स्वरुप में होता है। 

मुझे यह बात नहीं समझ में आती है कि ये सारे बुद्धिजीवी (MSM, Social Media, राजनेता) मिलकर इस देश का सद्भाव मिटाने में क्यूँ लगे हुए हैं। राजनेताओं को तो सब कोसते हैं, पर मेरे विश्लेषण में, इस सौहार्द्र को बिगाड़ने में तथाकथित  "MSM, Social Media" कि भूमिका कहीं ज्यादा है। आज कल गांवों में भी Internet और Social Media कि पैठ बढ़ती जा रही है, परन्तु अधिकतर लोगों को इसका सावधानी पूर्वक प्रयोग नहीं पता है। 

इनसारे तथ्यों से तो एक बात तो सिद्ध ही होती है कि MSM, Social Media का प्रयोग और इनसे मिलने वाली सूचनाओं का बहुत ही सावधानी पूर्वक प्रयोग करने कि आवश्यकता है। परन्तु इसके लिए लोगों को जागरूक करना भी आवश्यक है। और ये तभी सम्भव हो सकता है कि हम सब इसमें भागीदार बने क्यूंकि इस दिशा में सरकारी प्रयास सर्वदा किसी राजनीति से प्रेरित रहेंगे और किसी धर्म विशेष को निशाना बनाएंगे।  

Tuesday, November 26, 2013

आज कल खुशियाँ मेरा पता पूछ रही हैं

आज कल खुशियाँ मेरा पता पूछ रही हैं।
मुझे शक़ है कि कोई तूफ़ान आने वाला है।
कल तो हद ही हो गयी!! दर्द भी नहीं हुआ!!
अब तो यक़ीं हो गया, कि दिल बैठने वाला है।

अरे उसने तो मुझे अमीर समझ लिया यारों,
अब तो पक्का है, कि मेरा मजाक होने वाला है।
मांग कर लाया था चंद खुशियां उधार कि,
इन गफलतों में तो, हर एक गम भी लुटने वाला है।

मै वो नहीं, जो तुम समझ बैठो हो,
मै वो हूँ, जो खुद को ही ना समझ पाया है।
वक़्त के थपेड़ों ने कुछ ऐसी चोट दी,
कि हर एक अच्छी बात में, चोर नजर आया है।

मेरी रूह भी मुझसे मिलने कि नाकाम कोशिश में है,
और इस अफरा तफरी में, मेरा वज़ूद भी खोने वाला है।
आकर कोई तो सम्भाल ले मुझको !!
वर्ना मेरे दिल और दिमाग का हर तार बिखरने वाला है।



Sunday, November 24, 2013

My Childhood - मेरा बचपन

खुशबू की तरह महका हूँ, चिड़ियों की तरह चहका हूँ। हवाओं की तरह बहका हूँ, वो मेरा बचपन ही कुछ ऐसा ही था अब तो इस शहर में साँसों के लिए भी तरसा हूँ

सरपत के झुंडो में,
खेतो में बागीचों में।
नदियों में तालाबों में,

खेला हूँ, कूदा हूँ और खूब दौड़ा हूँ।
पर अब तो इस शहर में एक बारामदे के लिए तरसा हूँ।

कच्चे पक्के रास्तों पर,
पगडंडियों पर चौरास्ते पर।
घर के पीछे वाले मैदानो पर,

साइकिल के साथ खूब भागा हूँ और गिरा हूँ,
पर अब तो इस शहर में एक खाली सड़क के लिए तरसा हूँ।

Friday, November 22, 2013

Aaj aur kal ke neta ji - आज और कल के नेता जी,

आज twitter पर, एक बंधू से चर्चा हो रही थी, चर्चा के ही दौरान "नेता जी" का जिक्र हो आया। हम दोनों इस बात से सहमत थे कि इस देश में तो एक ही नेता जी थे पर आज कल बहरूपियों का ज़माना है।  प्रस्तुत हैं मेरे विचार:

वो बोलते थे खून दो आज़ादी दूंगा
ये बोलते हैं खून पियूँगा और कुछ नहीं दूंगा।

वो बोलते थे मै तुम्हारे साथ लड़ूंगा
ये बोलते है तुम मेरे लिए लड़ो और मरो।

वो दान मांगते थे देश के लिए
ये देश लूटते हैं, अपने लिए।

उन्होंने जान गंवाई, कुछ सिला भी नहीं मिला
इन्होने जीने भी नहीं दिया और सब कुछ छीन लिया।

उन्होंने ने अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ाए
ये हमारे छक्के छुड़ा रहे हैं।

काश वो नेता जी कुछ और दिन साथ होते
इन धूर्त नेतोओं के चंगुल से हम कहीं दूर होते।

अब तो यही आस है कि 'वो' नेता जी फिर से आये,
'खून' भले ही ले ले हमारा, पर हमे 'आज़ादी' दिलाएं।

Monday, November 18, 2013

Asar Lucknavi - kuchh Shair

वह काम कर बुलन्द हो जिससे मजाके-जीस्त,
दिन जिन्दगी के गिनते नही माहो-साल में।  


किसी के काम न जो आए वह आदमी क्या है,
जो अपनी ही फिक्र में गुजरे, वह जिन्दगी क्या है? 


शिकवा किया था अज़ रहे-उल्फ़त, तंज़ समझकर रूठे हो
हम भी नादिम अपनी ख़ता पर, आओ, तुम भी जाने दो। 

ख्वाब बुनिए, खूब बुनिए, मगर इतना सोचिए,
इसमें है ताना ही ताना, या कहीं बाना भी है। 


उनके आने की बंधी थी आस जब तक हमनशीं,
सुबह हो जाती थी अक्सर जानिबे - दर देखते। 


किससे कहिए और क्या कहिए, सुनने वाला कोई नहीं,
कुछ घुट-घुट कर देख लिया, अब शोर मचाकर देखेंगे। 





Monday, November 11, 2013

Khushq Aankhein aur Mera Desh

अश्क़ सूख गए कुछ इस तरह,
सोचते-सोचते हो गयी सहर।
ख़ुश्क़ आँखों ने फिर पूछा मुझे,
दिन गुज़ारना है अब किस तरह।

हर रोज़ कुछ हाल ऐसा ही है,
मन में सवाल कुछ ऐसा ही है।
ये इश्क़ और मुहब्बत नहीं हैं यारों,
मेरे बेहाल देश का ख्याल ऐसा ही है।

आज कल सूरज कुछ ऐसे निकलता है,
कि इसकी रौशनी में भी धुंधला सा दिखता है।
ठंढ तो अब भी है हवा में पुरानी जैसी ही,
पर सियासती गर्मी का असर दिखता है।

क्या यही देश कि प्रगति कि निशानी है?
क्या यही हमारे उदय कि कहानी है?
क्या ऐसे ही उत्थान करेंगे हम?
क्या यही हम सब ने मिलकर ठानी है?

गर नहीं, तो ये समय है जागने का,
देखने का, सोचने का, और कुछ कर गुज़रने का।
आपस के मतभेदों से ऊपर उठने का,
और एक खूबसूरत भारत देश बनाने का।

Wednesday, November 6, 2013

Meri Diwali - Kal aur Aaj

इस बार दीवाली कि धूम ही कुछ और थी
तेल के दिए कम और बिजली कि लड़ियों कि दौड़ थी।
पर फिर भी इसमें कुछ पुरानी यादें ताजा थीं,
धान कि रंगोली, तेल के दिए और माँ कि पूजा शामिल थी।

पर और भी कुछ बदल गया है कल और आज में,
दीवाली के त्यौहार में, इसके मानाने के अंदाज़ में।
पांव तो आज भी छूते हैं, बच्चे मेरे गांव में,
पर Happy Diwali गूंजता है इन सारे 'प्रणाम' में।

कुछ साल पहले 'दिये' कुम्हार दे जाता था,
बदले में उसके खेत से अनाज ले जाता था।
आज कल बाज़ार में खरीदने पर भी नहीं मिलते ये,
एक ज़माने में मेरा छोटा भाई, पुराने दीयों से  तराज़ू बनता था।

अब कोई घर को गोबर से लीपता नहीं है
ना ही बाहर कि दीवालों पर चूना लगता है।
पक्के घरों कि बात ही कुछ और है,
क्यूंकि वहाँ ८-१० साल में ही कभी, paint लग पाता है।

सब कुछ शायद और भी तेजी से बदलता जाएगा,
बिजली कि लड़ियों और मोमबत्तियों से दीवाली मन जाएगा।
बस इतनी सी गुज़ारिश है कि दिल से उल्लास कम ना हो,
मिट्टी दीये भले ना हो, पर प्यार कि रौशनी हर और हो।



Saturday, October 26, 2013

Bachpan Ki Kavitaayen - my childhood friends

बचपन की आरंभिक कविताओं की एक याद ह्रदय के किसी अंश में अब भी तारो ताजा है. यद्यपि, आज की भाग दौड़ भरी जीवन शैली एवं धन की आवश्यकताओं ने उन्हें पुनर्जीवित करने का प्रयास सहज रूप से पीछे छोड़ दिया है. आज बहुद दिनों बाद उन्हीं कुछ कविताओं का स्मरण सा हो आया. मैं उन्हीं कुछ कविताओं को आपके समक्ष पुनः प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ और यह भी समझाने का प्रयास करूँगा की इन कविताओं का तब और अब के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है:

(१)
उठो लाल अब आँखें खोलो, 
पानी लायीं हूँ, मुह धो लो,

बीती रात, कमल दल फूले, 
उनके ऊपर भंवरें झूलें।

चिड़ियाँ चहक उठी पेड़ों पर, 
बहने लगी हवा अति सुन्दर,

नभ में न्यारी लाली छाई, 
धरती ने प्यारी छवि पायी। 

भोर हुआ सूरज उग आया, 
जल में पड़ी सुनहरी छाया।

नन्हीं नन्हीं किरणें आईं, 
फूल खिले कलियां मुस्काई,

इतना सुन्दर समय ना खॊओ, 
मेरे प्यारे अब मत सॊओ। - Aodhya Singh Upadhyay "Hariaudh"

ये कविता मेरे ह्रदय में इतनी बसी हुई है की, आज भी अक्सर गुगुनाता रहता हूँ, ख़ास कर के तब जब कभी सुबह उठने का अवसर मिलता है। आपको तो पता है की आजकल की सुबह office जाने की तैयारी में ही ख़तम हो जाती और सुबह का विहंगम दृश्य कहीं पीछे ही रह जाता है, परन्तु अगर इस कविता का ही स्मरण कर लिया जाए तो सुबह का एक चित्रण मन मष्तिष्क में हो जाता है।

(२)
नर हो ना निराश करो मन को, 
कुछ काम करो, कुछ काम करो.
जग में रह के निज नाम करो,
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो,
समझो जसमे यह व्यर्थ ना हो.
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो ना निराश करो मन को।

संभलो की सुयोग ना जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को ना निरा सपना
पथ आप प्रशश्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो ना निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हे सब तत्त्व यहाँ,
फिर जा सकता वह वह सत्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो ना निराश करो मन को।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाए अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो ना तजो निज साधन को
नर हो ना निराश करो मन को। - Maithili Sharan Gupt

यह कविता बचपन से ही प्रेरणा स्रोत रही है। मुझे तो याद भी नहीं की कितनी बार मैंने यह कविता विद्यालय प्रांगण में सुनाई होगी। मुख्यतया इस कविता की पहली और अंतिम पद मुझे अत्यधिक पसंद हैं। गुप्त जी जिस तरह से ये अभिप्रेरक कविता रचित की है, ये किसी भी मनुष्य को आगे प्रेरित करने के लिए पर्याप्त है।

(३)
वीर तुम बढे चलो, धीर तुम बढे चलो!

हाथ में ध्वजा रहे, बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं, दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढे चलो, धीर तुम बढे चलो!

सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं, तुम निडर डटो वहीं 
वीर तुम बढे चलो, धीर तुम बढे चलो!

प्रात हो की रात हो संग हो ना साथ हो
सूर्य से बढे चलो चन्द्र से बढे चलो
वीर तुम बढे चलो, धीर तुम बढे चलो!

एक ध्वज लिए हुए एक प्रण लिए हुए
मात्रि भूमि के लिए पित्री भूमि के लिए
वीर तुम बढे चलो, धीर तुम बढे चलो!

एना भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
यत्न्न भर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढे चलो, धीर तुम बढे चलो! - Dwarika Prasad Maheshwari

इस कविता को मै कैसे भूल सकता हूँ। मुझे आज भी स्पष्ट रूप से याद है, मै 2nd class में था और मेरे विद्यालय ने निश्चित किया की १५ अगस्त के दिन प्रभात फेरी का प्रतिनिधित्व मै करूंगा। मै बहुत खुश हुआ था। यही कविता प्रभात फेरी में गाई गयी थी। मै एक पंक्ति बोलता था और सारे बच्चे उसी पंक्ति को दुहराते थे. एक अजाब ही उत्साह था, मै तिरंगा हाथ में लिए हुए और मुरी ऊर्जा के साथ बोलते हुये -  वीर तुम बढे चलो, धीर तुम बढे चलो!

मै इस post को यहीं पर विराम देता हूँ। यादें तो बहुत सारी हैं, बाकी कविताओं को फिर कभी आपके पास लेकर आऊंगा।

Pyaar Baanto, Nafrat NahiN

चलो एक छोटा घरोंदा बनातें हैं,
कुछ ईंट तुम लाओ, कुछ हम लाते हैं। 
नफरत फैली है चारो और इस दुनिया में,
इस घरोंदें में प्यार की कुछ रेत मिलाते हैं।

नफरत की आंधियां, तूफ़ान बनने लगीं हैं,
घरों को, शहरों को, इंसानियत को निगलने लगीं हैं।
चलो एक जज्बातों की प्यारी दीवाल बनाते हैं,
इन आँधियों को, वापसी की राह दिखाते हैं।

बात बस इतनी सी समझनी है दोस्तों,
सियासती रंग अक्सर 'लाल' होता है।
घर के बंटवारे में तो फिर भी प्यार पनप सकता है,
सियासती बंटवारे में हर घर हलाल होता है।

वक़्त की ताकीद है की हमे चेत जाना है,
नफरत को छोड़, प्यार को आगे बढ़ाना हैं,
फिर चलो - एक छोटा घरोंदा बनातें हैं,
कुछ ईंट तुम लाओ, कुछ हम लाते हैं। 
और - इस घरोंदें में प्यार की कुछ रेत मिलाते हैं। 

Sunday, August 18, 2013

Mere Vichaar - Mera Desh

पत्थरों के हैं ये जंगल, पत्थरों के ये मकां,
बन गया है आज देखो, पत्थरों का ये जहाँ।

बन गया इंसा भी देखो, आज यूँ पत्थरों का,
भावनाएं पत्थरों की, दिल भी पत्थर का हुआ।

क्या यही थी आशाएं, जब मिली आज़ादी थी,
वो (अँगरेज़) तो थे बेदर्द ज़ालिम, ये भी यूँ निष्ठुर मिले (नेता)।

ठग रहे हैं हमको ये, हर पल यहाँ इस देश में,
कुछ जेल में, कुछ आसनों पे, कुछ साधुओं के वेश मे।

पर सोच के देखो जरा, इन्हें, किसने दिया अधिकार है,
यूँ लूटने का, छीनने का - हमारा क्यूँ नहीं प्रतिकार है,

Friday, August 9, 2013

Mai Achchha Hoon...

    बसों में जूझती ज़िन्दगी को देखता हूँ,
    तो सोचता हूँ, की मैं अच्छा हूँ।

    सड़कों पर घिसटती जिंदा लाशों को देखता हूँ,
    तो सोचता हूँ, की मैं अच्छा हूँ।

    वो कहते हैं की एक टीस सी है मेरी आँखों में .......

    दुनिया में फैले दर्द को देखता हूँ,
    तो सोचता हूँ, की मैं अच्छा हूँ।

Monday, July 15, 2013

Barish Ki Bunde - Gaon ki Galiyaan

काले मेघों का एक जत्था दूर गगन में छाया,
ऐसा सुन्दर हुआ नजारा, मन को मेरे भाया।
हवा से मिलकर जल की बूंदे, सिहरन सी फिर लायीं,,
धरती माँ ने अपना सुन्दर, अद्भुत आँचल लहराया।

खेतों में धानों के पौधे हरियाली बिखराएँ,
देख-देख कर अपनी मेहनत, यूँ किसान हर्षाये।
ताल-तलैया उमड़-उमड़ कर अपनी ख़ुशी जताएं,
चिड़ियों का कलरव भी जैसे राग मल्हार सुनाये।

ऐसा सुन्दर दृश्य मनोरम, नितदिन यूँ ही आये,
दुःख बिसरे, मन नृत्य करे; खुशहाली ही छाये।

Thursday, March 28, 2013

New Direction in Life

मन में एक हलचल सी थी,
धुआं था पर आग ना थी।
पूछ रही थी ज़िन्दगी मुझसे,
ये सही था या एक गलत राह थी।

बरसों से एक दुनिया बसाई थी मैंने,
कुछ सुहाने सपने बुने थे अपने।
पर आज सब छोड़ आया हूँ मैं,
एक नया जहाँ चुन लिया मैंने।

दिख रहा है ये रास्ता कठिन मगर,
कठिनाईयां ही लक्ष्य तक पहुंचाती हैं।
अड़चने तो आती हैं बहुत सी इस राह में,
पर, यही तो जीने की कला सिखाती हैं।