Thursday, December 19, 2013

आज के "पारस पत्थर" - एक राजनीतिक व्यंग्य

भारत, खास करके दिल्ली, में एक अलग और अच्छे तरीके का राजनीतिक परिवर्तन हो रहा है। इसमें हमारे "आर्यपुत्र" और "पारस पत्थर" जी का सर्वाधिक योगदान है। ये दोनों नाम मेरे दिए हुए कदापि नहीं हैं - तो आप लोगों को जो भी उचित/अनुचित भाषा का प्रयोग करना है वो आप मेरे twitter मित्र पाण्डेय जी के लिए कीजिये ;) ये कविता एक सरल सा हास्य व्यंग्य है, इससे ज्यादा मै नहीं समझाऊंगा क्यूंकि आप सब खुद समझदार हैं, पर अगर कुछ समझ ना आये तो भी आप हंसियेगा अवश्य:

हे बुद्धिमान
हे सत्यवान
तुम ज्ञान कुम्भ
तुम हो महान..................................!

तुम नीति रचयिता
तुम अनुपालक
तुम ही पीड़ित
तुम निर्णायक..................................!

तुम ऊर्जावान
तुम ही प्रकाश
तुम अवरोधक
तुम ही विकास..................................!

तुम सच्चरित्र
ईमानदार
तुम सच्चाई का
महाकाव्य..................................!

मर्यादपुरुष
तुम कल्पवृक्ष
तुम इस पीढ़ी के
अमर पुत्र..................................!

हम मिट्टी हैं
तुम "पारस" हो
हम शोषित
तुम उद्धारक हो..................................!

तुम पाप विनाशक
तुम दुःख हर्ता
"हम निबलों विकलों" के
तुम ही मालिक, कर्ता-धर्ता..................................!

अब तो आओ हे जन-नायक
कुछ नीति बनाओ, सुख-दायक
हम भी विकसे, फलें-फूलें
सरकार चलाओ इस लायक..................................!

हे आर्य-पुत्र, पारस-रतन, सद्भावना से पूर्ण।
जन-अभिलाषा मान कर, ये काम करो सम्पूर्ण.....................................................!

*=*=*=इति=*=*=*

Monday, December 16, 2013

नए भारत का नया इतिहास बना - Remembering 16 Dec 12

कुछ हवा भी सर्द रही होगी
कुछ दर्द भरी आहें भी..!
तुम्हारी चीखों से गूंजी होंगी
वो सुनसान राहें भी.....................!

सुनी होगी तुम्हारी वेदना, पीड़ा
और तुम्हारी कराहें भी..!
तुम्हारे रुदन से, क्या न भीगी होंगी !!!
उन दरिंदों कि निगाहें भी.....................!

चाँद भी थमा होगा, रात भी ठहरी होगी,
शर्मायी होगी, तारों कि रौशनी भी..!
पर रुकी नहीं हैवानियत, और
उन वहशी दरिंदो कि दरिंदगी भी.....................!

उस सुबह शर्म आयी होगी,
सूरज को उगने में भी..!
हवाओं को बहने और
चिड़ियों को चहकने में भी.....................!

फिर एक बड़ा सैलाब आया
भावनाओं का तूफ़ान आया
"निर्भया" तुम्हारे बलिदान* से
सुषुप्त समाज में नव-ज्ञान आया.....................!

पर अब भी 'तुम्हारा' हिसाब बाकी है
इस क्रान्ति का असली पड़ाव बाकी है
सरकार और क़ानून तो बदलते रहेंगे
हमारे विचारों में एक बदलाव बाकी है.....................!

इस लगी चिंगारी को आग बना
अपने इस आंदोलन को सैलाब बना
बदल दे समाज की विचारधारा को
नए भारत का एक नया इतिहास बना.....................!

* I say it "बलिदान"; many people might not agree to it, but a loss of life which shakes up entire society for something could be very well termed as "बलिदान"

Saturday, December 14, 2013

मै और मेरा इलाहाबाद :)

इलाहाबाद....!! कहाँ से शुरू करूँ..… एक ऐसा शहर जो कि मेरे घर से बाहर मेरा पहला बसेरा बना। मुझे बहुत अच्छे से याद है, जुलाई महीने कि वो बादलों से भरी रात, जब अनाज के बोरे और एक बैग लेकर मै अपने बड़े भाई के एक मित्र के साथ, UP Roadway कि बस में इलाहाबाद के लिए रवाना हुआ था।

बात को fast forward करता हूँ क्यूंकि यहाँ मै अपनी भावनात्मक व्यथा का वर्णन नहीं करना चाहता :) इलाहबाद में मै चार साल रहा। बहुत ही सुखद और यादगार सफ़र रहा। सुबह सवेरे जलेबी-दही और कचोरी का सेवन; फिर खुद रोटी-सब्जी या चावल-दाल बनाना (पूरा खाना बनाने का समय कभी रहा नहीं) और फिर college का रास्ता नापना। मंगलवार और शनिवार के दिन "लेटे हुए हनुमान जी" के दर्शन और भी बहुत कुछ..... the list is very long one :)

अपने पूरे प्रवास के दौरान एक बात तो मुझे समझ में आ ही गयी थी कि, पूरे इलाहाबाद कि अर्थव्यवस्था छात्रो के  भरोसे चलती है। और यह बात मै हवा में नहीं बोल रहा हूँ, ऐसा कई बार हुआ है कि मै होली या दीवाली के अवकाश में घर नहीं गया और इलाहबाद कि गलियों में चारो तरफ एक सन्नाटा सा दिखायी देता था।  एक और बात जो बहुत बाद में मुझे दिल्ली आने के बाद समझ में आयी - जो कि काफी दिलचस्प है। मुझे याद है कि इलाहाबाद में हम किसी भी घर में घुस जाते थे किराए का कमरा पता करने के लिए; कोई हिचकिचाहट नहीं होती थी कि ये lodge है या कोई महल। दिल्ली आने के बाद ये समझ में आया कि अपना प्यारा शहर इलाहबाद कितना सरल तरीके से क्रियान्वित होता था।

पढाई CMP Degree College में हुई जिसको हम सब लोग "चौतरफा मार पीट"  college भी बोलते थे। अब ऐसा नहीं है कि वहाँ पर केवल मार पीट ही होती थी, पर इस बात में अतिशयोक्ति भी नहीं है :). कॉलेज लाइफ बहुत ही अच्छी रही। ख़ास कर मुझे अपने physics के classes बहुत ही पसंद आते थे। Chemistry में बहुत दिलचस्पी नहीं थी पर Chemistry lab में मुझे एक बात बहुत अच्छी लगती थी कि practicals के दौरान ढेर सारे रंगों का एक नज़ारा देखने को मिलता था। जिन लोगों ने इस कॉलेज में पढ़ाई कि है उनको Chemistry lab का एक और महत्व पता है ;) इसकी पीछे वाली दीवाल के पार ही हमारे प्यारे छात्र बंधुओं का आग्नेयास्त्रों के सारे परिक्षण और प्रयोग होते थे।

इतना अच्छा समय गुजारने के बाद मैंने करीब ११ साल पहले ये शहर छोड़ा और अपनी भाग दौड़ में इतना डूब गया कि वापस कभी जाने का मौका नहीं मिला। मन बहुत करता था कि मै एक बार उस धरती को नमन कर के आऊँ जिसके योगदान ने ही मुझे इस मुक़ाम पर पहुचाया है। मेरा सफ़र पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे गाँव से शुरू होकर आज यहाँ तक पंहुचा है तो इसका काफी हद तक श्रेय इलाहाबाद को जाता है।

सौभाग्यवश इस बार, विश्व बैंक के एक मिशन के लिए, मुझे इलाहाबाद और वाराणसी जाने का अवसर मिला। मै इस बात को सुनते ही काफी उत्तेजित हो गया था। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मै कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करुँ। उत्तेजना के साथ दुःख इस बात का था कि मुझे केवल ३-४ घंटे का समय होगा, अपने इस प्यारे शहर को देखने के लिए। हमारी पूरी टीम ने T B Sapru जिला अस्पताल का निरिक्षण किया।  उसके बाद मै पूरी टीम को लेकर "देहाती रसगुल्ला" गया - जो लोग इलाहाबाद से परिचित हैं उन्हें पता होगा कि मै इस शहर कि एक ख़ास चीज का जिक्र कर रहा हूँ। उसके बाद संगम और हनुमान जी के मंदिर का दर्शन। फिर दारागंज कि गलियों का थोड़ा दर्शन और फिर हम निकल पड़े वाराणसी कि ओर :( दुःख हुआ पर ख़ुशी भी कि एक बार फिर उस धरती के दर्शन हुए जो की मेरे रग-रग में बसा हुआ है।

एक बात तो मुझे कहनी पड़ेगी कि मुझे अब भी वो सारी गलियां और सड़के याद थी और अपनी पूरी टीम को शहर दिखाने के बाद काफी इतरा रहा था। मुझे ख़ुशी इस बात कि भी थी कि ये शहर पहले से कहीं ज्यादा साफ़ सुथरा दिखा। बाह्यरूप तो अब भी पुराने जैसा ही था, पर आतंरिक संचालन में  एक व्यवस्था नजर आयी। टी बी सप्रू हॉस्पिटल भी काफी साफ़ सुथरा दिखा जो कि एक सरकारी अस्पताल के हिसाब से काफी अलग एवं सुखद अनुभव था।

अंत में केवल एक ही बात कहना चाहूंगा कि ये शहर एक अलग विचारधारा पर चलता है; मुझे इस शहर से प्यार है और हमेशा रहेगा। इस शहर में - विरोध भी हैं तो एकता भी है - भिन्नता भी है तो समानता भी है - और - घमंड भी है तो सहिष्णुता भी है।

प्रयाग नगरी में सबका स्वागत है :)

Few Short Poems

(1) मेरा वज़ूद 


मैं कहीं खुद को ही छोड़ आया हूँ अब तो वो रास्ता भी याद नहीं बिखरने लगा है अब वजूद मेरा 

मैं कभी जिंदा था, अब याद नहीं



(2) बिछड़ने कि कवायद

this is for one of my friend - writing on his behalf for someone else :)


वो आयी अपने होंठों पे एक मुस्कान लिए हुए
अपनी आँखों में मेरे सपने, मेरे अरमान लिए हुए।।
पर ये क्या..!! ये बिछड़ने कि कवायद तो नहीं .....  ??
हम तो बैठे थे, अपनी मुहब्बत का पैगाम लिए हुए।।


(3) मेरी आवाज़

यूँ तूने भी साथ छोड़ दिया,
कुछ तेरी याद भी जाती नहीं।
अब सुनाये भी तो किसे 'राहुल'

मेरी आवाज़ भी मुझे आती नहीं। 

Sunday, December 1, 2013

साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता: मेरे गाँव कि कहानी

कहाँ से प्रारम्भ करूँ !! मैं एक बहुत ही छोटे से गांव से सम्बन्ध रखता हूँ। जहाँ अब भी लोग १० घंटे से ज्यादा बिजली और प्रमुख सड़क से संपर्क-मार्ग के लिए तरस रहे हैं। पर बच्चे, बड़े या बूढ़ो कि भावनाओं कि उड़ान इन कठिनाइयों से कहीं ऊपर है। पर आज मै अपने गावं कि विशेषता बताने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, पर पृष्टभूमि देना आवश्यक है ताकि आप ये समझ सके कि मै किस जगह के बारे में लिख रहा हूँ। 

आज कल हर तरफ एक ही चर्चा है कि अमुक पार्टी सांप्रदायिक है और अमुक धर्मनिरपेक्ष। अमुक धर्म के लोग दक्षिण-पंथी है तो अमुक वाम-पंथी। परन्तु अब भी मुझे समस्या कि जड़ उस तरह से नहीं समझ में आती जिस तरह से हमारे समाज के बहुत से बुद्धिजीवी समझाने का प्रयास करते हैं - कम से कम मेरे गांव के वातावरण में। 

मेरे गांव में होली का त्यौहार एक अलग तरीके से मनाया जाता है -गांव के केंद्र से जन-मण्डली गाते-बजाते निकलती है और दिन ख़तम होने से पहले सारे घरों पर कम से कम २-५ मिनट का फगुआ (Holi folk song) का कार्यक्रम होता है। पर ये ख़ास बात नहीं हो सकती क्यूंकि यह प्रक्रिया बहुत सारे गांवो में दुहराई जाती है। खास बात यह है कि इस मंडली का प्रमुख ढोलक वादक एक हिन्दू नहीं है और जब तक वो जीवित थे तब तक उनके बिना आये ये प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होती थी।

मुहर्रम का त्यौहार !! बचपन से मुझे इस दिन का एक मात्र आकर्षण हुआ करता था - रंग-बिरंगे ताजियों को देखना और उस जूलुस का हिस्सा बनना जो इसे लेकर  गांव से निकलता था। इस ताजिये को रखने का चबूतरा जिसके घर पर बना है वो एक मुस्लिम नहीं है और वो परिवार उस चबूतरे का पूरा रख-रखाव करता है। बचपन में मेरी माँ, मुझे हिदायत देकर भेजती थी कि मै ताजिये को छू कर आशीर्वाद लेकर आऊं। मुझे और मेरे जैसे बहुत सारे बच्चों को ये पता नहीं होता था कि वहाँ जा कर आशीर्वाद कैसे लेना है, पर हम जाते थे और ताजिये को छू कर अशीतवाद लेते थे। 

लेकिन क्या ये दोनों उदहारण धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता के हैं - ना किसी को तब पता था ना अब (कम से कम मै तो यही सोचता हूँ)

इस देश में धर्म को लेकर इतने दंगे-फसाद हुए, पर उनका कोई ख़ास असर मैंने कभी भी मेरे गांव में नहीं देखा था। लोग समाचार देखते/ पढ़ते थे, राजनीति को कोसते थे और अपने काम पर लग जाते थे। परन्तु इस भावना का धीरे-धीरे ह्रास होता हुआ दिख रहा था। अभी भी मेरे गांव में ऊपर से देखने में सब कुछ पहले जैसा है, पर लगता है कि गांव के दो हिस्सों में सामंजस्य कि कमी हो रही है। 

मै इस बात को नहीं समझ पा रहा हूँ कि जब मेरे गांव में कभी भी कोई दंगा-फसाद नहीं हुआ तो इस बढ़ते वैमनस्य का कारण क्या है? एक सबसे बड़ा कारण मुझे समझ में आता है - तथाकथित 'Main Stream Media (MSM)' कि भूमिका। देश में कहीं कुछ भी बात होती है उसे जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ा  कर इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे कि पूरे देश में दो धर्मो के लोग एक दुसरे के खून के प्यासे हैं। आज कल Digital TV के आगमन से MSM का प्रवेश लगभग गांव के हर घर में हो गया है और ऐसे ख़बरों का और इनके अंदर छिपी वैमनस्य कि भावनाओं का प्रचार बहुत ही वृहद् स्वरुप में होता है। 

मुझे यह बात नहीं समझ में आती है कि ये सारे बुद्धिजीवी (MSM, Social Media, राजनेता) मिलकर इस देश का सद्भाव मिटाने में क्यूँ लगे हुए हैं। राजनेताओं को तो सब कोसते हैं, पर मेरे विश्लेषण में, इस सौहार्द्र को बिगाड़ने में तथाकथित  "MSM, Social Media" कि भूमिका कहीं ज्यादा है। आज कल गांवों में भी Internet और Social Media कि पैठ बढ़ती जा रही है, परन्तु अधिकतर लोगों को इसका सावधानी पूर्वक प्रयोग नहीं पता है। 

इनसारे तथ्यों से तो एक बात तो सिद्ध ही होती है कि MSM, Social Media का प्रयोग और इनसे मिलने वाली सूचनाओं का बहुत ही सावधानी पूर्वक प्रयोग करने कि आवश्यकता है। परन्तु इसके लिए लोगों को जागरूक करना भी आवश्यक है। और ये तभी सम्भव हो सकता है कि हम सब इसमें भागीदार बने क्यूंकि इस दिशा में सरकारी प्रयास सर्वदा किसी राजनीति से प्रेरित रहेंगे और किसी धर्म विशेष को निशाना बनाएंगे।