Sunday, December 1, 2013

साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता: मेरे गाँव कि कहानी

कहाँ से प्रारम्भ करूँ !! मैं एक बहुत ही छोटे से गांव से सम्बन्ध रखता हूँ। जहाँ अब भी लोग १० घंटे से ज्यादा बिजली और प्रमुख सड़क से संपर्क-मार्ग के लिए तरस रहे हैं। पर बच्चे, बड़े या बूढ़ो कि भावनाओं कि उड़ान इन कठिनाइयों से कहीं ऊपर है। पर आज मै अपने गावं कि विशेषता बताने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, पर पृष्टभूमि देना आवश्यक है ताकि आप ये समझ सके कि मै किस जगह के बारे में लिख रहा हूँ। 

आज कल हर तरफ एक ही चर्चा है कि अमुक पार्टी सांप्रदायिक है और अमुक धर्मनिरपेक्ष। अमुक धर्म के लोग दक्षिण-पंथी है तो अमुक वाम-पंथी। परन्तु अब भी मुझे समस्या कि जड़ उस तरह से नहीं समझ में आती जिस तरह से हमारे समाज के बहुत से बुद्धिजीवी समझाने का प्रयास करते हैं - कम से कम मेरे गांव के वातावरण में। 

मेरे गांव में होली का त्यौहार एक अलग तरीके से मनाया जाता है -गांव के केंद्र से जन-मण्डली गाते-बजाते निकलती है और दिन ख़तम होने से पहले सारे घरों पर कम से कम २-५ मिनट का फगुआ (Holi folk song) का कार्यक्रम होता है। पर ये ख़ास बात नहीं हो सकती क्यूंकि यह प्रक्रिया बहुत सारे गांवो में दुहराई जाती है। खास बात यह है कि इस मंडली का प्रमुख ढोलक वादक एक हिन्दू नहीं है और जब तक वो जीवित थे तब तक उनके बिना आये ये प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होती थी।

मुहर्रम का त्यौहार !! बचपन से मुझे इस दिन का एक मात्र आकर्षण हुआ करता था - रंग-बिरंगे ताजियों को देखना और उस जूलुस का हिस्सा बनना जो इसे लेकर  गांव से निकलता था। इस ताजिये को रखने का चबूतरा जिसके घर पर बना है वो एक मुस्लिम नहीं है और वो परिवार उस चबूतरे का पूरा रख-रखाव करता है। बचपन में मेरी माँ, मुझे हिदायत देकर भेजती थी कि मै ताजिये को छू कर आशीर्वाद लेकर आऊं। मुझे और मेरे जैसे बहुत सारे बच्चों को ये पता नहीं होता था कि वहाँ जा कर आशीर्वाद कैसे लेना है, पर हम जाते थे और ताजिये को छू कर अशीतवाद लेते थे। 

लेकिन क्या ये दोनों उदहारण धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता के हैं - ना किसी को तब पता था ना अब (कम से कम मै तो यही सोचता हूँ)

इस देश में धर्म को लेकर इतने दंगे-फसाद हुए, पर उनका कोई ख़ास असर मैंने कभी भी मेरे गांव में नहीं देखा था। लोग समाचार देखते/ पढ़ते थे, राजनीति को कोसते थे और अपने काम पर लग जाते थे। परन्तु इस भावना का धीरे-धीरे ह्रास होता हुआ दिख रहा था। अभी भी मेरे गांव में ऊपर से देखने में सब कुछ पहले जैसा है, पर लगता है कि गांव के दो हिस्सों में सामंजस्य कि कमी हो रही है। 

मै इस बात को नहीं समझ पा रहा हूँ कि जब मेरे गांव में कभी भी कोई दंगा-फसाद नहीं हुआ तो इस बढ़ते वैमनस्य का कारण क्या है? एक सबसे बड़ा कारण मुझे समझ में आता है - तथाकथित 'Main Stream Media (MSM)' कि भूमिका। देश में कहीं कुछ भी बात होती है उसे जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ा  कर इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे कि पूरे देश में दो धर्मो के लोग एक दुसरे के खून के प्यासे हैं। आज कल Digital TV के आगमन से MSM का प्रवेश लगभग गांव के हर घर में हो गया है और ऐसे ख़बरों का और इनके अंदर छिपी वैमनस्य कि भावनाओं का प्रचार बहुत ही वृहद् स्वरुप में होता है। 

मुझे यह बात नहीं समझ में आती है कि ये सारे बुद्धिजीवी (MSM, Social Media, राजनेता) मिलकर इस देश का सद्भाव मिटाने में क्यूँ लगे हुए हैं। राजनेताओं को तो सब कोसते हैं, पर मेरे विश्लेषण में, इस सौहार्द्र को बिगाड़ने में तथाकथित  "MSM, Social Media" कि भूमिका कहीं ज्यादा है। आज कल गांवों में भी Internet और Social Media कि पैठ बढ़ती जा रही है, परन्तु अधिकतर लोगों को इसका सावधानी पूर्वक प्रयोग नहीं पता है। 

इनसारे तथ्यों से तो एक बात तो सिद्ध ही होती है कि MSM, Social Media का प्रयोग और इनसे मिलने वाली सूचनाओं का बहुत ही सावधानी पूर्वक प्रयोग करने कि आवश्यकता है। परन्तु इसके लिए लोगों को जागरूक करना भी आवश्यक है। और ये तभी सम्भव हो सकता है कि हम सब इसमें भागीदार बने क्यूंकि इस दिशा में सरकारी प्रयास सर्वदा किसी राजनीति से प्रेरित रहेंगे और किसी धर्म विशेष को निशाना बनाएंगे।  

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