Tuesday, May 20, 2014

झिंगुरी मिस्त्री - मेरे गाँव के महारथी !!

काफी दिनों से व्यस्तता और समयाभाव के कारण लिखना संभव नहीं हो पाया। आज सोचा कुछ लिखूं तो समझ नहीं आया - क्या?? बहुत सोच विचार कर मै अपने गाँव के "झिंगुरी मिस्त्री" की कहानी सुनाने जा रहा हूँ। एक बात मै शुरू में ही बता दूँ कि ये कोई कहानी नहीं है, बल्कि ये पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकतर गाँवों की जीवन शैली का एक चित्र है।

जैसा की पहले भी बता चूका हूँ, मै पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव से आता हूँ। अगर मै ये बोलूं कि मेरा गाँव पूरे प्रदेश का एक प्रतिरूप है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी - यहाँ हिन्दू, मुसलमान और दोनों धर्मों के विभिन्न जातियों का मिश्रण है। हमारे गाँवों में हर जाति समूह एक विशेष कार्य करने में कुशल होते हैं और गाँव के हर घर में उनकी उपयोगिता उसी आधार निर्धारित होती है। जैसे बढ़ई-लकड़ी का काम, लुहार-लोहे (Iron) से सम्बंधित काम, कुम्हार (या भोजपुरी में कोहाँर)-मिट्टी के बर्तन बनाने काम इत्यादि। वैसे आज कल वैश्वीकरण के इस दौर में कार्य आवंटन की ये प्रथा गौण सी हो गयी है और हर जाती समूह के लोग अलग-२ तरह के काम कर रहे हैं; परन्तु ये व्यवस्था काफी हद तक मेरे बचपन के दिनों में अस्तित्व में थी

हमारे ही गाँव में रहते हैं झिंगुरी मिस्त्री - पूरा नाम तो झिंगुरी विश्वकर्मा था, परन्तु लोगों ने विश्वकर्मा हटाकर मिस्त्री कर दिया था। अब किसने किया, क्यों किया - नहीं पता। मिस्त्री थे तो लुहार पर अपनी २.५ इंच के बाजू और ६ इंच की छाती के साथ बढ़ई और लुहार दोनों का काम बखूबी करते थे। उनकी काया के बारे में बस इतना ही कह सकता हूँ की जब बैशाख और जेठ की दुपहरी में लू चलती थी तो डर लगता था की कहीं मिस्त्री दूसरे गाँव में उड़ कर ना पहुंच जाएँ :-)
झिंगुरी मिस्त्री 

मिस्त्री के साथ जुडी मेरी सबसे पुरानी यादों में जो बात मुझे याद आती है वो ये कि, मेरी दादी अक्सर हमें आखा/चलनी के छेद ठीक करवाने भेजा करती थीं - जो लोग खेती-बारी के काम से परिचित हैं, वो इस की अहमियत समझ सकते हैं। मिस्त्री अपने छोटे से झोपड़े में एक भट्टी जलाकर बैठे रहते थे और हम कौतुहल के साथ उनके काम को देखा करते थे। अपनी मरियल जैसी काया के साथ जब वो बड़ा हथौड़ा उठाते थे और जोर से "हियाँ" चिल्ला कर लोहे को पीटते थे तो ऐसा लगता था की दुनिया का आठवां अजूबा हो। आज तक ये बात समझ नहीं आई की मिस्त्री अपनी वजन से ज्यादा का हथौड़ा कैसे उठा लेते थे :)

मिस्त्री हर काम में माहिर थे - कुछ नया बनवाना है, पुराना मरम्मत करना है, कुछ जुगाड़ से सेट करना है; आप बोलो और वो कर के देते थे। सबसे ख़ास बात ये की वक़्त-बे-वक़्त जब भी आपको उनकी आवश्यकता हो वो उपलब्ध होते थे। मुझे याद है उन्होंने एक लकड़ी आलमारी १९९० के करीब बनायीं थी, वो इतनी मजबूत और भारी थी कि ५-६ लोगो की जरूरत पड़ती थी उसको एक जगह से दूसरे जगह ले जाने के लिए - अभी वही अलमारी तोड़ कर कुछ बेंच बने हुए हैं बैठने के लिए। और यही आलमारी उस समय हमारा सहारा बनी थी जब हम कच्चा घर गिरा कर नया बना रहे थे - खाने का सामान, राशन और रोजमर्रा की अधिकतर वस्तुएं इसी आलमारी में, उस १ साल के लिए बनाये गए झोपड़े में, पायी जाती थीं।

जब भी उनको याद करता हूँ तो साइकिल पर बैठा उनका बेजान सा शरीर और उस पर दम लगाकर पैडल मारते झिंगुरी मिस्त्री की तस्वीर सामने आती है। उनका मेरे घर से एक अलग ही लगाव था, किसी और को यदि मना भी कर दें, लेकिन हमारे परिवार को कभी नहीं। मुझे याद है, एक बार मिस्त्री की तबियत ख़राब थी और हमें अपने कच्चे घर (खपरैल वाले) में होली के पहले कुछ काम करना था (गांव में होली और दिवाली दोनों त्योहारों के पहले घर की सफाई, लिपाई-पुताई और मरम्मत होती है और कच्चे घरों में लकड़ी का काफी काम होता था)। मिस्त्री आँगन में सीढ़ी लगाकर एक कोने में लगे लकड़ी के एक हिस्से की मरम्मत कर रहे थे (उस हिस्से को गाँव की बोलचाल भाषा में मुहब्बत कहते हैं, क्यों कहते हैं पता नहीं ;)) और उसी समय सीढ़ी फिसल गयी और वो गिर गए। मेरी माता जी ने बिना देर किये खुद अपने हाथो से उनके पैर में बाम लगाया; मिस्त्री ने बहुत मना किया क्यूंकि एक ब्राह्मण का किसी दूसरे का पैर छूना उस समय की मान्यताओं के हिसाब से सही नहीं था। शायद इस घटना ने उनको मेरे परिवार के और भी करीब ला दिया था।

मिस्त्री को (या और भी काम करने वाले लोगों को) कभी पैसे नहीं दिए जाते थे - अनाज दिया जाता था। अनाज भी दो तरीके से १) जब भी कोई काम पूरा किया तो उसके अनुसार अनाज दे दिया और २) जब भी फसल कटती थी तब इनको बुला कर बोला जाता था की जितना भी ये बाँध कर उठा कर ले जा सकते हैं उतना ले जाएँ (इस प्रक्रिया को भोजपुरी में 'लेहना' बोला जाता है)। ये व्यवस्था हर उस व्यक्ति के लिए थी जो गाँव में अलग-२ काम करता था। लेहना की एक सबसे ख़ास बात होती है की आप इसे ले जाने के लिए शरीर का ही प्रयोग कर सकते हैं , साइकिल या बैलगाड़ी नहीं; ताकि आप एक सीमा से बाहर ना ले जा सकें। सबसे मजा आता था जब मिस्त्री लेहना लेने आते थे - उनसे तो बहुत काम उठ पता था, फिर हम लोग उनको थोड़ा परेशान करने के बाद, उनको साइकिल पर ले जाने देते थे।

इस बार घर गया था तो देखा कि झिंगुरी मिस्त्री अब भी वैसे ही दिखते हैं; पर अब बाज़ारी युग में उनके पास काम काम हो गया है. कच्चे घर नहीं रह गए तो होली-दिवाली का भी काम नहीं रह गया। फर्नीचर तो अब बड़े शहर से आ जाते हैं; बच्चों को चलना सिखाने के लिए अब कोई उनके पास लढ़िया बनवाने नहीं जाता। आखा/चलनी तो लगता है कि जैसे जरूरत ही ना हो; और हंसिया बनाने की तो बात ही नहीं क्यूंकि खेत तो अब मशीन से काट जाते हैं; और इसी लिए लेहना लेने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। मुझे नहीं पता की उनका जीवन यापन कैसे चल रहा है, पर इतना पता है की अब उनके "हियाँ" करके हथौड़ा मारना खत्म सा हो गया है। आप सोच रहे होंगे की इसमें कहानी क्या है, पर अहम मुद्दा ये है की गाँव तेजी से बदल रहे हैं और मिस्त्री जैसे, कार्य विशेष में निपुण लोगों का अगर ध्यान नहीं रखा गया तो इनके जीवन और बाकी गांव की जीवन शैली पर भी प्रभाव पड़ेगा।

अगले पोस्ट में मै ऐसे ही एक और खास व्यक्ति के बारे में बात करूँगा, तब तक के लिए विदा :-)