Monday, September 1, 2014

वेदना के स्वर एवं इसकी स्वीकार्यता

वेदना क्या केवल स्वरों से?
मुख के हाव भाव व्यर्थ?
तुम्हे मेरे कहने की प्रतीक्षा?
मेरे चक्षुओं का प्रयास व्यर्थ?

तो लो, मै अपनी कहानी सुनाता हूँ,
और फिर प्रश्न उठाऊंगा; पूछूँगा तुमसे !!
क्या तुम बिना कहे नहीं समझ पाए?
या फिर यह केवल तुम्हारा चिर-परिचित स्वांग था?

पंख थे मेरे और मै उन्मुक्त उड़ता था !
बादलों से ठिठोली हवाओं संग खेलता था।
सतरंगी स्वप्नों के आलिंगन में रात होती थी,
अवसाद शून्य थे एवं भविष्य सुखद दिखता था।

विधि के विधान से अनभिज्ञ, मै मूढ़ !
भविष्य की योजनाओं को बुनता था.......!
संभवतः स्वयं को विधाता मान बैठा था!!!
भविष्य -मेरे अनुसार, कुछ ऐसा ही प्रतीत होता था। 

फिर एक दिन कुछ चुभा 
और स्वप्न बिखर गए 
वो सफेद बादल, वो पंख 
- सब, छिन्न भिन्न हो गए !! 

शारीरिक संवेदनाओं की तरंगे अवरुद्ध हो गयीं,
कशेरुकों के बीच आपस में एक युद्ध हो गयी। 
मष्तिष्क में स्वप्नों का सृजन बंद हो गया, 
और देखते ही देखते मेरी उड़ान रुक सी गयी।

योजनायें बन के एक कोने में पड़ी हुई 
मुझे चिढाती हुई, धूल खाती हुई। 
शारीरिक पीड़ा की चिंता नहीं थी,
मानसिक कुंठा, मन में अवसाद लाती हुई। 

कई वर्ष बीत गए, स्वयं से युद्ध करते हए 
इस समस्या को समझाते, और समझते हुए। 
हार नहीं माना हूँ, और ना कभी मानूंगा !!!
परन्तु आतंरिक वेदना से आज भी लड़ते हुए। 

सामाजिक जीवन में तो 
प्रसन्न रहता हूँ,
लोगों में खुशियाँ बांटता 
और हंसाता हूँ। 

बस एक तुच्छ सी प्रार्थना है,
जब भी वेदना के स्वर मुखर हों। 
मेरे बोलने की प्रतीक्षा किये बिना, 
आप सब मेरे साथ, मेरा आलंबन हों।

14 comments:

  1. Yes often it goes in vain. Specially in personal relationships despite knowing how much other person means to us we want to listen to it.

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  2. it has good words ..... waiting for full poem creating s of your heart feelings Sh.Rahul Ji, great.

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  3. Pains.....those pains are usually part of life but things become different when pains become life itself ..... easier said than done......the life that lives it can only understand....the life that lives it......the life.....too expressive ....nice to read ....wish pains end .....wish the words of joy bloom ....wish could share pains....

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    1. Your worda are more than enough to share pain :)) thanks for being there and constant support... SIR ;))

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  4. Bahut bahut sundar, jitni bhi taareef ki jaaye kam hai.

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  5. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति राहुल भाई ..
    वेदना के मुखरित स्वर..., वाह

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    1. धन्यवाद....आपकी सराहना मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण है।

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  6. सुंदर अभिव्यक्ति. पढ़ कर मैथिली शरण गुप्त कि पंक्तियाँ याद आयीं:
    ईश्वर हैं अवलम्बन को
    नर हो ना निराश करो मन को!

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    1. पसंद करने के लिये धन्यवाद :) जी इश्वर का ही सहारा होना चाहिये.....!!

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  7. aapne bilkul theek vichar prastut kiye apne kavita men.Yahi to jeevan ka satya hai.maanav aksar hi apne ko Ishwar se aage samjhne lagta hai lekin ant me use Ishwar ki satta par vishwas karna padta hai.Shri Rahul ji aapne vastvik vichar prastut kiye ati uttam.(Y)

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    1. Thanks for your wishes and appreciating the poem..!!

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