Tuesday, January 20, 2015

मै मिथ्या हूँ, और यही सत्य है

एक अलग प्रयास, सही गलत पता नहीं। और जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, सही गलत से अधिक लिखने में स्वयं को आनंद आना चाहिए :) पढ़िये और अपने विचार से अवगत कराइये:

मै मिथ्या हूँ, और यही सत्य है।

मै जो अंदर हूँ, वो बाहर नहीं !!
जो कथन में है, वो कर्म में नहीं !!
मै नश्वर हूँ, मै मिथ्या हूँ।।

मै सांत्वना देता हूँ, पर स्वयं दुखी !! 
मै सहायता करता हूँ, पर स्वयं असहाय !!
मै निर्बल हूँ, मै मिथ्या हूँ।

मै स्वतंत्र हूँ, पर द्वन्द से घिरा हुआ !!
मै धनवान हूँ, पर महत्वाकांक्षा का शिकार !!
मै "निर्धन" हूँ, मै मिथ्या हूँ।।

"मै" अहम है, "मै" मिथ्या है !
"मै" के बिना मै ब्रह्म, और यही परम सत्य है।