Friday, June 26, 2015

लेखनी रुकी क्यूँ है?

एक अरसे से कुछ लिखा ही नहीं।
ऐसा नहीं कि कुछ मिला ही नहीं!
कलम रुक सी जाती है हर बार,
तुम्हारी तरह, इसको भी तो गिला नहीं?

छंद-वंद, नज़्म-वज़्म, अशरार-वशरार,
दुःख-सुख, नोक-झोक, प्यार-व्यार-
सब पढ़े, देखे और महसूस किये मैंने।
कविता इन्ही से? पर 'भाव' मिला ही नहीं।

जब भी बुनना चाहा, शब्दों की लड़ियाँ,  
टूट गए अहसास के धागे, बिखर गयी कड़ियाँ।
सोचता और फिर जोड़ने की कोशिश करता-
इन अधपकी कविताओं का कद्रदान मिला ही नहीं।

Work in progress.............................................................!

4 comments:

  1. kabhi badalon si, kabhi bijli si kadakti rahi meri ahsason si
    Moor ke tarha mere kalam ko tha intezar kuch boondon ki
    Kitna kuch shikayat thi mujhe un barishon se, lekin hawa ka rukh hum badal na payee
    Bin barish ke yadoon main dube, lekin phir bhi na jane hum kuch kyon likh na payee

    Youn to mujhe pata hai, eak din sab chot jayega,
    mere bad, meri likhi hui alfaz mera jindegi ban jayega.
    Uss jindegi ko kaise bayan karon, mar kar bhi kaise jiya karoon
    Sooch to dil main hain, na jaane usko sabdon main kaise bayan karoon

    Sorry bro, don't have more time! Good luck!!

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  2. टूट गए अहसास के धागे, बिखर गयी कड़ियाँ।
    सोचता और फिर जोड़ने की कोशिश करता-
    इन अधपकी कविताओं का कद्रदान मिला ही नहीं।
    wonderful feelings linked with heart

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  3. इस रचना के बाद तो यही समझ आता है ! "सौ सुनार की और एक लुहार की " वाकई बेहतरीन रचना है ! बस अब लिखते रहिये !

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    1. धन्यवाद सर :) आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए महत्वपूर्ण है।

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