Thursday, April 28, 2016

जनस्वास्थ्य को समझें - एक सच्ची घटना के माध्यम से।

यह पोस्ट मेरे एक दूसरे ब्लॉग में प्रकाशित किया गया था; समयाभाव के कारण वो ब्लॉग बंद करना पड़ रहा है, अतः कुछ महत्वपूर्ण पोस्ट यहाँ पुनः प्रकाशित किये जा रहे हैं। 

जनस्वास्थ्य की परिभाषा: "जनस्वास्थ्य विज्ञान और कला का एक ऐसा संगम है जो संगठित प्रयासों एवं समाज, संगठनों, सार्वजनिक और निजी, समुदायों और व्यक्तियों के लिए उचित विकल्पों को ध्यान में रखते हुए बीमारी को रोकने और जीवन के समय को बढ़ाने की दिशा में काम करता है। सरल भाषा में यदि इसे समझें तो जनस्वास्थ्य व्यक्तियों एवं जनसमूहों को घोर बिमारियों से बचाने कि दिशा में काम करता है। जनस्वास्थ्य की क्रिया-कलापों का क्रियान्वयन स्थानीय परिथितियों, जन-भावनाओं को ध्यान में रख कर किया जाता है। चूँकि यह सदियों से चले आ रहे रीतियों एवं जीवन जीने की शैली को बदलने की दिशा में काम करता है, इसमें जन-संवाद की एक बहुत ही बड़ी भूमिका होती है। अंतिम पंक्तियों में स्थानीय परिस्थितियां, जन-भावना, सामाजिक रीतियों आदि के बारे में बताया गया है। ये घटना इन्ही मुद्दों को समझाने एवं सही कदम उठाने को लेकर है। 

घटना २००६ की है; स्थान - गुजरात का एक आदिवासी जिला। ये जिला गुजरात राज्य के मानकों के अनुसार निचले पायदानों पर था। पर २००६ में एक नए मुख्य जिला स्वास्थ्य अधिकार (Chief District Health Officer - CDHO) और जिला कार्यक्रम प्रबंधक (District Programme Coordinator - DPC) की नियुक्ति हुई थी और इस जोड़ी ने कुछ अच्छे प्रयास किये जो सराहे भी गए। परन्तु पिछड़ा जिला होने के कारण अभी भी बहुत कुछ करना बाकी था। 

ये घटना जुड़ी है पल्स-पोलियो टीकाकरण कार्यक्रम से - अमिताभ बच्चन जी ने इसके लिए "दो बून्द जिंदगी की" नामक अभियान का नेतृत्व किया था। इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन की समीक्षा के दौरान अधिकारियों ने ये बात स्वीकार किया कि पिछले साल की तुलना में इस साल प्रगति बेहतर हुई है। परन्तु उसी मीटिंग में CDHO ने ये बात उठाई के एक ब्लॉक है जिसके आंकड़े तदनुरूप प्रगति की तरफ इशारा नहीं करते। संख्याओं का गाँवो के अनुसार विश्लेषण एवं स्थानीय ब्लॉक अधिकारियों से बात करके पता चला कि कुछ गाँव हैं जहाँ पर पोलियो टीकाकरण की प्रगति नगण्य है। जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ होने के कारण DPC को इसके तह में जाने का आदेश दिया गया और साथ ही यह भी कहा गया कि इसका समाधान ढूँढा जाय। 

काफी अनुसन्धान करने के बाद DPC और उनके दल ने अपना ध्यान २-३ गाँवो पर केंद्रित किया। ये गाँव ब्लॉक को जनपद मुख्यालय से जोड़ने वाली मुख्य सड़क से करीब ४० किमी की दूरी पर बसे हैं; परन्तु अगम्य क्षेत्र होने के कारण यहाँ पहुँचने में करीब ३ घंटे लगते हैं। इन गाँवो में एक विशेष संप्रदाय के लोग रहते हैं, इनके नाम, रहन-सहन, खाना, सब कुछ एक आम आदिवासी गुजराती जैसे ही हैं परन्तु ये लोग अपने आप को एक अलग देश का मानते हैं। इनका अपना एक अलग झंडा भी है। सम्प्रदाय के प्रमुख को ये "मालिक" के नाम से बुलाते हैं और ये अपने मालिक के कहने पर कुछ भी कर सकते हैं। इनके मालिक के शब्द इनके लिए भगवान के शब्द जैसे हैं। बाहर के लोगों को ये हमेशा संदेह की दृष्टि से देखते हैं और उनका प्रवेश लगभग वर्जित है। क्षेत्र दुर्गम होने के कारण सड़कें उतनी अच्छी नहीं हैं परन्तु गुजरात सरकार ने बिजली की व्यस्था अवश्य की है - मजेदार बात ये है कि ये अपने को एक अलग देश मानने के बाद भी बहुत सारी सरकारी सुविधाओं का उपयोग करते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात - इन गाँवों में इस विशेष सम्प्रदाय के अतिरिक्त भी कुछ और परिवार रहते हैं पर इनकी संख्या १०% से भी कम होगी। 

इन सारे मुद्दों को ध्यान में रखते हुए CDHO ने ये निश्चित किया कि DPC और २ और लोगों का एक छोटा दल इस गाँव में टीवी रिपोर्टर बन कर जायेंगे (इससे गाँव में प्रवेश आसान हो जाता) और अभिवावकों द्वारा अपने बच्चों को पोलियो का ड्राप ना पिलाने के कारणों का पता लगाएंगे। करीब १८० बच्चों को पोलियो की खुराक दी जानी थे जिसमे से केवल सरपंच ने अपने बच्चों को पिलवाई थी। टीम ने सरपंच और कुछ और प्रमुख लोगों से बात की; पोलियो के विरोध के कुछ मुख्य कारणों को मैं यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ:

  • पोलियो की दवाई विदेशी कम्पनी ने बनायीं है, ये बन्दर की किडनी से बनायीं जाती है और इसे एड्स होने का खतरा है।  बच्चे नपुंसक भी हो सकते हैं - एक दुकानदार (भ्रान्ति/गलत धारणा/misinformation)
  • जब तक हमारे "मालिक" नहीं कहेंगे हम कोई भी दवा नहीं लेंगे - एक गाँववाला (अन्धविश्वास)
  • दूसरे गाँववाले को ये बताने पर कि पोलियो खुराक ना देने से बच्चे में अपंगता आ सकती है - अगर हमारे बच्चे मर गए तो इससे सरकार को क्या? (यथा स्थिति बनाये रखने की हठधर्मिता)
  • हमने कभी पोलियो खुराक नहीं ली और हमें कुछ नहीं हुआ तो हमारे बच्चों को भी कुछ नहीं होगा - एक महिला (पुरानी रीतियाँ/जीवन शैली को न बदलने की जिद)
  • कुछ महिलाओं (१-२) ने ये भी कहा कि यदि वो अपने बच्चों को पोलियो की खुराक दिलाना भी चाहें तो भी नहीं कर सकती, क्योंकि निर्णय लेने का अधिकार केवल पुरुषों के पास है (महिला सशक्तिकरण की कमी)
यदि आप इन कारणों को देखें तो हर एक कारण को जनस्वास्थ्य से सम्बंधित मुद्दों से जोड़ा जा सकता है। और जैसा कि मैंने पहले लेख में कहा था - इन कारणों का निदान करने के लिए चिकित्सीय देखभाल कि नहीं वरन सही संसूचनाओं, परामर्श, पक्षसमर्थन/एडवोकेसी (इस समुदाय के मुखिया एवं प्रबुद्ध जनों के साथ) की आवश्यकता है। और इसके बाद भी हो सकता है कि बहुत कम लोग ही पोलियो की खुराक दिलाने के लिए तैयार हों। जनस्वास्थ्य के क्रियाकलापों के क्रियान्वयन में इसलिए समय लगता है और ये सबसे बड़ा अंतर है अस्पतालों में बिमारियों के निदान एवं जनस्वास्थ्य की गतिविधियों में। 

अब इस कहानी को समाप्त करने का समय है पर उससे पहले मै ये तो बता दूँ कि DPC और उनके छोटे से दल ने क्या गुल खिलाये :) 
  • दल ने गाँव वालों को ये नहीं पता चलने दिया कि वो स्वास्थ्य विभाग से हैं। २ दिन गाँव में रुके और लोगों से संवाद करने का प्रयास किया। हर विषय पर बहस हुई, और दल ने तर्कसंगत बातों से उन्हें मनाने का प्रयास किया।  
  • टीम ने गाँव में देखा कि स्वच्छता का आभाव है और काफी लोग चोट लगने, बुखार, और कुछ और छोटी-२ परेशानियों से ग्रसित हैं परन्तु फिर भी दवा नहीं ले रहे। दूसरे दिन तक टीम ने सरपंच और कुछ और लोगों को विश्वास में लेकर एक स्थानीय NGO को मेडिकल कैंप लगाने के लिए बुलाया। इस छोटे प्रयास के बाद गाँव के कुछ और लोग भी टीम के समर्थन में आये। 
  • तीसरे दिन तक प्रयास यहाँ तक पहुँच गया कि गाँव के कुछ लोग सामने आ कर बोले कि सरकारी ANM / डॉक्टर को पोलियो की खुराक लेकर बुलाया जाय, जो लेना चाहेंगे वो लेंगे और जो नहीं चाहेंगे वो नहीं लेंगे। 
  • उस दिन १८० में से करीब २६ बच्चों ने खुराक ली - ये अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। 
  • पूरे गाँव को मनाने में १-२ साल लग गए पर प्रयास यहीं से शुरू हो गया; और हाँ, जाने से पहले टीवी रिपोर्टर वाला सच गाँव वालों के सामने रखा गया।
जनस्वास्थ्य के कार्यक्रम काफी विस्तृत व् बृहद होते हैं, ये छोटी घटना केवल उदाहरण के रूप में दी गयी गयी है। और जाते-जाते ये कहना चाहूंगा कि मै इस बात की पुष्टि या खंडन नहीं कर सकता कि मैं इस घटनाक्रम का हिस्सा था या नहीं। अपने विचारों से अवगत कराइयेगा।